18 मई 2020

सातधार की दीवार

सातधार की दीवार....! 

यह चायना की दीवार नहीं,  बस्तर मे सातधार की दीवार है. जब अस्सी के दशक में बोधघाट परियोजना स्वीकृत होने के बाद इन्द्रावती मे बांध निर्माण का कार्य प्रगति पर था. उस समय इन्द्रावती के बहाव को कम करने के लिए नदी मे बड़ी बड़ी दीवारे बनायी गयी. 


पर्यावरण की अपार क्षति एवं भारी विरोध के कारण बोधघाट परियोजना स्थगित हो गयी किन्तु ये दीवारे रह गयी. दीवार के उस तरफ़ पानी के ठहराव के कारण इन्द्रावती मे गहरी झील बन गयी है. यहाँ पानी इतना साफ़ है कि  गहराई के बावजूद भी नदी का तल स्पष्ट दिखाई देता है. 

नदी मे नाव चलाता मछुवारा ऐसा दिखलाई पड़ता है जैसे दर्पण पर बैठकर नाव चला रहा हो...!

31 दिसंबर 2019

पालनार की पेंटिंग में दंतेवाड़ा पर्यटन का निमंत्रण

पालनार की पेंटिंग में दंतेवाड़ा पर्यटन का निमंत्रण.....!

दंतेवाड़ा के कुआंकोंडा विकासखंड में पालनार नामक छोटा सा ग्राम स्थित है। इस गांव की आवासीय संस्था की चारदीवारी पर दंतेवाड़ा जिले की कला संस्कृति और पर्यटन स्थलों को बेहद खूबसूरत तरीके से उकेरा गया है। हालांकि कलाकार का नाम तो ज्ञात नही किन्तु उसने जिसने कुशलता के साथ चित्रकारी की है जिससे ये सारे चित्र जीवंत प्रतीत होते है।

चित्रों का आकार और उचित रंगों का प्रयोग बेहद ही प्रशंसनीय है। ये चित्र दंतेवाड़ा कला संस्कृति को दिखाने के साथ साथ पर्यटन को भी प्रोत्साहित करते है। चित्रकारी इतनी मनमोहक और जीवंत है कि, कोई भी फोटोग्राफर इन कलाकृतियों को अपने कैमरे में कैद करने से रोक ही नहीं सकता है।

उकेरे गये चित्र अपने आप में अपनी पुरी कहानी कह देते है। स्थानीय संस्कृति और रोजमर्रा के क्रियाकलापों को बहुत जानदार तरीके से चित्रण किया गया है। नाव में खड़े होकर महिला द्वारा पक्षियों को दाना चुगाना एक नयी प्रकार संस्कृति को दिखाता है।

नाव में खड़ा मल्लाह जाल फैलाकर मछली पकड़ रहा है तो खेत मेें छतोड़ी पहनकर घुमता किसान काफी आकर्षक लग रहा है। बैलगाड़ी के पीछे जाती महिला का दृश्य तो रोज देखने को मिलता है। अंधेरे में दीपक जलाती हुई महिला अंधकार से रोशनी की ओर जाने का संदेश देती है।

जंगल में भ्रमण के बाद तालाब के पानी से प्यास बुझाते बालक का दृश्य आज की हकीकत है। विद्यालय में पढ़ते बच्चे, और लाईब्रेरी में पुस्तके खोजती बालिका का दृश्य दंतेवाड़ा में पढ़ने की जागरूकता को दर्शाता है।

आराध्यदेवी मां दंतेश्वरी के आर्शीवाद के साथ बारसूर दंतेवाड़ा , फूलपाड़, चित्रकोट को बहुत शानदार तरीके से चित्रित किया गया है। ढोलकल में परशुराम और भगवान गणेशजी के पौराणिक तथ्यों को भी चित्र के माध्यम से कहने का प्रयास किया गया है।
आखिरी में बालक द्वारा फोटोग्राफी का दृश्य आप सभी को निमंत्रण देता है कि आईये 2020 में देखिये दंतेवाड़ा की कला संस्कृति और पर्यटन स्थलों को और कैद कीजिये उन स्वर्णिम दृश्यो को अपने कैमरे में।
साथ ही साथ बेहद खूबसूरत एवं जीवंत चित्रकारी के लिये उस कलाकार को बहुत बहुत साधुवाद।
ओम !
इस लिंक द्वारा आप पुरे चित्र देख सकते है पालनार की पेंटिंग

26 दिसंबर 2019

कांगेर घाटी की दुर्लभ हरी गुफा

कांगेर घाटी की दुर्लभ हरी गुफा.......!

बस्तर की कांगेर घाटी में अनेकों ऐसे रहस्यमयी स्थल है जिससे आज की दुनिया पुरी तरह अनजान है। कांगेर घाटी की कोटमसर गुफा विश्व प्रसिद्ध है वहीं ऐसी अनेको और भी गुफायें है जिसकी जानकारी सिर्फ वहां के ग्रामीणों को ही है।
कांगेर घाटी में कोटमसर की तरह ही अनेकों गुफायें है जहां पहुंचने का मार्ग सिर्फ वहां के स्थानीय ग्रामीणों को ही ज्ञात है। कोटमसर गुफा अपने स्टेगलाईट, अंधी मछलियों के लिये जग प्रसिद्ध है।
इसी तरह कांगेर घाटी में एक अन्य गुफा हाल के कुछ सालों में प्रकाश में आयी है इस गुफा को हरी गुफा के नाम से जाना जाता है। कोटमसर से लगभग 7 किलोमीटर की दुरी पर घने जंगलों में स्थित इस गुफा का पहुंच मार्ग सिर्फ ग्रामीणों को ही मालूम है।

गुफा का प्रवेश मार्ग भले ही सकरा है किन्तु अंदर कोटमसर गुफा की तरह विशाल कक्ष मौजूद है। इस गुफा के प्रथम कक्ष में छतों से लटकते स्टेग्लेटाइट के नमीयुक्त पत्थरों पर सूरज का प्रकाश पड़ता है और नमीयुक्त चट्टानों पर शैवाल उग आते हैं। इन्हीं शैवालों की वजह से ये चट्टानें हरी दिखाई पड़ती हैं। इसी हरे पन के कारण इस गुफा को हरी गुफा का नाम दिया गया है।
हरी गुफा की सबसे बड़ी खासियत इसका हरा होना तो है ही इसके अलावा ये बस्तर की एकमात्र ऐसी गुफा है जहां दोपहर बाद कुछ देर के लिए सूरज की रौशनी अंदर आती है। इस गुफा को अभी आम पर्यटकों के लिए नहीं खोला गया है।
हरी गुफा के इस शानदार छायाचित्र के लिये उमेश सिंह जी का बहुत आभार ।

20 मई 2019

कोलाब डैम- एक बेहतरीन पर्यटन स्थल

कोलाब डैम- एक बेहतरीन पर्यटन स्थल.......!

इंद्रावती के बाद बस्तर में दुसरी सबसे बड़ी कोई नदी है तो वह शबरी नदी। शबरी नदी सुकमा के पास से बहते हुए दक्षिण में छत्तीसगढ़ की सीमा रेखा बनाती है। ओडिसा के सींकाराम पहाड़ियों से निकलकर शबरी गोदावरी में विलीन हो जाती है। इंद्रावती के बाद शबरी गोदावरी की दुसरी सबसे बड़ी सहायक नदी है। ओडिसा में शबरी को कोलाब या खोलाब के नाम से भी जाना जाता है।
इसी कोलाब पर ओडिसा के कोरापुट जिले में बहुत बड़ा डेम बनाया गया है। यह डेम इस क्षेत्र में कोलाब डैम के नाम से चर्चित है। कोलाब डैम बस्तर के लोगों के लिये बेहद ही महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। हर साल हजारों लोेग कोलाब डैम में पिकनिक मनाने एवं घुमने के लिये जाते है।

कोलाब डैम बनाने की सुगबुगाहट अंग्रेजों के समय ही हो चुकी थी। 1976 में कोलाब डैम का निर्माण कार्य पुरा हुआ। कोलाब डैम में दुर दुर तक सिर्फ पानी ही पानी दिखलाई पड़ता है। जहां तक नजर जाती है वहां तक सिर्फ पानी ही नजर आता है। डैम के पास बहुत ही सुंदर बगीचा बनाया गया है।

जिसमें हजारों रंग बिरंगे फूल हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते है। बगीचे में फैली हरियाली और पेड़ों की शीतल छांव पर्यटकों को काफी सुकून देते है। डैम में हिलोरे मारता कोलाब का पानी एक नया संगीत सुनाता है। आसपास के ग्रामों की ओड़िया संस्कृति भी काफी आकर्षित करती है। कोलाब डैम एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है। जगदलपुर से ओडिसा के जयपोर होते हुुए डैम तक स्वयं के वाहन से जाया जा सकता है।

22 अप्रैल 2019

देव फ़ूलो से महक उठा बस्तर

देव फ़ूलो से महक उठा बस्तर....!
राह चलते फोटोग्राफ़ी 02
अभी बस्तर मे देव फ़ूलो की बहार है. पुरा बस्तर इन फ़ूलो की भीनी खुश्बु से महक उठा है. ये फ़ूल बस्तर मे देव फ़ूल, ह्जारी फ़ूल और सियाडी फ़ूल के नाम से जाने जाते हैं. इन फ़ूलो का अधिकारिक नाम चम्पा है.

बस्तर मे देवी देवताओ को अर्पित किये जाने के कारण इन फ़ूलो को देव फ़ूल कहा जाता है. इस समय पुरे बस्तर मे देवी देवताओ के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने हेतु जात्रा मेलो का दौर चल रहा है.
इसी समय ये फ़ूल भी खिलते है. इन्ही फ़ूलो को देवी देवताओ को अर्पित किया जाता है.

बस्तर मे गौर करने की बात है कि इन ह्जारी फ़ूलो के अधिकांश वृक्ष देव गुड़ी के पास ही मिलते हैं.
फ़ूलो से लदे इस पेड़ को देखते ही मै स्वयम को इसकी फोटोग्राफ़ी से रोक नहीं पाया.
राह चलते फ़ोटोग्राफ़ी की कड़ी मे यह दुसरी पोस्ट है. बाईक से कुल 70 किलोमीटर की यात्रा करते समय मैने जो देखा उसे उसी अवस्था मे कैमरे मे कैद किया.


राह चलते फ़ोटोग्राफ़ी मे पहले से कुछ भी तय नहीं होता कि क्या फोटो लेना है जो भी अच्छा लगे बस क्लिक कर लो.. हाँ कैमरा हरदम हाथों मे होना चाहिए , पता नहीं अगले मोड़ पर कौन सा अच्छा पल मिल जाये.

11 सितंबर 2018

बादलों का नगर - आकाश नगर

बादलों का नगर - आकाश नगर....!

बस्तर पूर्णतः पहाड़ी क्षेत्र है जो कि घने वनों से आच्छादित है। इन गगनचूंबी पहाड़ियों के कारण यहां का मौसम वर्ष भर सुहाना रहता है। बस्तर की बैलाडिला पहाड़ी श्रृंखला  अपने शुद्ध लौह अयस्क के लिये पुरे विश्व में मशहूर है। यहां की लौह खदान पुरे एशिया में सबसे बड़ी लौह खदानों में से एक है। बैलाडिला  पर्वत श्रृंखला में नंदीराज की चोटी पुरे बस्तर में पहली एवं छत्तीसगढ़ में दुसरी सबसे उंची चोटी है



इसकी उंचाई लगभग 3000 फिट तक है। नंदीराज पर्वत की आकृति बैल के कुबड़ के समान है जिसके कारण इस क्षेत्र को बैलाडिला के नाम से जाना जाता है। 1966 ई में एनएमडीसी ने बचेली और किरन्दुल से लौह अयस्क का खनना प्रारंभ किया था। पहाड़ों पर एनएमडीसी ने कर्मचारियों के रहने के लिये बचेली शहर में पहाड़ के उपर आकाश नगर एवं किरन्दुल में पहाड़ के उपर कैलाश नगर बसाये थे। ये बस्तर के पहले हिल स्टेशन थे। इन हिल स्टेशनों का मौसम बेहद ही सुहावना होता है। यहां समय बिताने का एक अलग ही अनुभव होता है। 



बैलाडिला की पुरी पहाड़ियां घने वनों से ढकी हुई है जिसके कारण यहां  साल भर वर्षा होते रहती है। अधिक उंचाई के कारण ये पहाड़ियां साल में अधिकतर समय बादलों से ढकी रहती है। आकाशनगर में बरसात के समय तो  बादल पुरी तरह से छा जाते है। बादलों का जमावड़ा हो जाता है जिसके कारण भरे दिन में भी एक फीट की दुरी का दृश्य भी नजर नही आता है। 


बादल घरों का दरवाजा खटखटाते है ऐसी अनोखी घटना सिर्फ आकाश नगर में ही होती है।  बादलों की दौड़ देखना हो तो आकाश नगर में ही इसका आनंद लिया जा सकता है। चेहरे पर पड़ती हल्की फुहारे तन मन को प्रफुल्लित कर देती है। आकाश नगर को बादलों का नगर कहे तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सचमूच बादलों से बाते और मित्रता सिर्फ आकाश नगर में ही की जा सकती है। 



बचेली से पहाड़ पर स्थित आकाश नगर तक जाने की कुल दुरी 30 किलोमीटर है। 30 किलोमीटर की धुमावदार सर्पीली घाटियों से जाते समय तन का रोम रोम रोमांचित हो जाता है। एक तरफ तो सुहावने मनमोहक दृश्य तो दुसरी तरफ गहरी खाईया ये दोनो के दृश्यों से भय  एवं रोमांच का मिश्रित भाव उत्पन्न होता है। तन पर पड़ती पानी की हल्की फुहारे तो खुशी को दुगुनी कर देती है। 

प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को पुरे देश में विश्वकर्मा जयंती बड़े धुमधाम से मनाई जाती है। बैलाडिला के इन औद्योगिक नगरों में भी विश्वकर्मा जयंती के दिन विश्वकर्मा भगवान की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन लौह अयस्क खनन कार्य पूर्णतः बंद रहता है। नक्सली घटनाओं के कारण आकाश नगर पूर्णतः खाली कर दिया गया है एवं आम लोगों की आवाजाही बंद है। 


17 सितंबर को ही मात्र एक दिन के लिये आकाश नगर सैलानियों के लिये खोल दिया जाता है जिसमें अपनी चारपहिया वाहनों या दोपहिया वाहनों से पर्यटक वहां जा पाते है। एनएमडीसी प्रबंधन के द्वारा भी पर्यटकों के आने जाने के लिये बस की व्यवस्था रहती है। खदान क्षेत्र में लगी भीमकाय वाहनों को देखने का अवसर इस दिन प्राप्त हो पाता है। इन दानवाकार वाहनों का आकार किसी तीन मंजिला भवन से कम नहीं होता है। इनके पहियें की उंचाई मात्र ही 10 फिट तक होती है। 



भक्तिमय वातावरण में , सर्पिलाकार घाटियों में बादलो के साथ सफर करने का अनुभव काफी रोमांचकारी होता है। ऐसा अनुभव लेना है तो 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती के उपलक्ष्य मे आकाशनगर जरूर आये। रायपुर से बचेली की कुल दुरी 450 किलोमीटर है। रायपुर से बैलाडिला की सीधी बसे उपलब्ध है। रायपुर से मात्र 12 घंटे के सफर से बैलाडिला पहुंचा जा सकता है। 


बैलाडिला , विशाखापटनम से यह सीधे रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है जिसके कारण ओडिसा एवं बंगाल से आप रेल के माध्यम से पहुंच सकते है। दुर्ग से रायपुर  होते हूये उडिसा के रास्ते से रेल के माध्यम से जगदलपुर और बैलाडिला पहुंचा जा सकता है.......ओम!
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