21 मई 2020

डबरी : खेत में जल की खेती

डबरी : खेत में जल की खेती
डबरी खेत में जल की खेती....! ’श्रीकृष्ण जुगनू
पानी को बचाकर रखना अनेक कार्यों की सिद्धि है। मुझे सुश्रुत का वह सूत्र याद आता है जिसमें वह जल स्रोत को वाप्य कहते हैं। सामान्य रूप में इसका मतलब बावड़ी होता है जिसे वापी (बावड़ी) भी कहा जाता है, लेकिन वाप्य शब्द वपन (बुवाई) से बना लगता है। इसमें पानी की खेती का वह पुरातन भाव छिपा है जब व्यक्ति ने बीजों की तरह पानी की भी खेती करनी चाही होगी और जल की ऐसी खेती ने न केवल भूमि की नमी को बनाए रखा बल्कि कृत्रिम सिंचाई पहला अध्याय शुरू किया जिसमें मछली जैसी जलीय शाक भी पली...। ( भारतीय संस्कृति और जल)

फेसबुक मित्र दामोदर सारंग ने छत्तीसगढ़ अंचल के सुकमा जिले में प्रचलित डबरी जैसे पारंपरिक जल स्रोत के चित्र साझा किए तो मैंने कबीला काल की इस प्रणाली के बारे में जानना चाहा। यह जल को जमा रखने की कोशिश है। यह डबरी वही है जिसे हम ष्डाबरष् कहते हैं। तुलसीदास ने भी डाबर ही कहा है। डबरी यानी अपने खेत में खेत की सिंचाई के लिए बनाया जाने वाला जलस्रोत। शायद यह कुओं से पुरानी विधि हो। घर और गांव वाले इसके निर्माण में मदद करते हैं। यह हमारा डाबर अथवा ष्डाबरकियाष् है। मेरे आसपास डाबर नाम से गांव भी बसे हैं। जल संरक्षण और समीप में बस्ती निवेश का सुंदर उदाहरण। डबरी को खेत में किसी एक किनारे पर बनाते हैं। जहां प्लव अथवा ढलान रहता हो, ऐसी जगह देखकर खुदाई की जाती है ताकि समूचे खेत का पानी उसमें एकत्रित हो सके। डबरी वर्षा जल को एकत्रित करती है। सिंचाई, घरेलू निस्तारण में उपयोगी तो है ही और यदि पानी की उपलब्धता वर्ष भर है तो डबरी मछली पालन के काम आती है यानी मछरी की डबरी।यह भूमि वाले किसान के खेत में ही बनाई जाती है। यह आकार में तालाब से छोटी लेकिन कुंड से बड़ी श्रेणी की रचना है। कभी कभी इसको ष्डबराष् भी कहते हैं। वर्षा से पहले पहले डबरा का काम पूरा कर लिया जाता है ताकि बूंद- बूंद पानी बचे और वर्षा का जल हर बीज को अंकुरण के लिए राजी कर सकता है, ऐसे में अति उपयोगी है ही। कुछ और बातें आपको बतानी है... अक्षय तृतीया पर जल दान की महत्ता है... यह मानकर जल पर चर्चा का मन हुआ। जय जय।

बस्तर मे माप का पैमाना - पायली

बस्तर मे माप का पैमाना - पायली....!

जैसे भार ग्राम में,तरल पदार्थ लीटर और लंबाई मी. में मापी जाती है.बस्तर में अनाज आदि मापने में आज भी प्राय:सोली-पैली का उपयोग किया जाता.कई लोग इसके लिए "पयली" या 'पायली'' भी उच्चारित करते हैं....!बस्तरिया हाट-बाजारों में महुआ,चावल,दाल,उड़द, कुलथी,चना,चिवड़ाआदि प्रति पैली/सोली की दर से विक्रय किया जाता है..!सोली छोटा पैमाना है जो लगभग 8 से.मी. व्यास व 11से.मी. गहरा पात्र है जिसमें लगभग 500 ग्राम अनाज समाता है...!वहीं पैली लगभग 14 सेमी व्यास व 15 से.मी. गहरा होता है.तथा इसमें 4 सोली अनाज बड़े आराम से आ जाता है...!
अनाज आदि उपज को भी बस्तरवासी प्राय: पैली से मापते हैं.20 पैली का माप यहाँ 1खण्डी कहा जाता है.किसी ने कहा कि मेरे घर 5 खण्डी उड़द हुआ यानी कि मतलब हुआ कि उसके यहाँ 5×20=100 पैली उत्पादन हुआ...!बस्तर में अन्न आदि के विनिमय के लिए प्राय: यही मापन यंत्र प्रयुक्त होते हैं....!हल्बी में एक मुहावरा भी है-आपलोय पैली के भरतो यानी दूसरों की न सुनकर,केवल अपनी हाँकना...!आप के तरफ़ पायली जैसे पैमाने को क्या कहा जाता है?
अशोक कुमार नेताम
आप हमे instagram मे @bastar_bhushan फ़ालो कर सकते हैं.

मित्रता के प्रतीक - कुड़ई फूल

मित्रता के प्रतीक - कुड़ई फूल.....!
बस्तर के जंगल इन दिनों कुड़ई फूल यानि कुटज की महक से गमक उठे हैं, ऐसा लगता है मानों कुदरत ने आगंतुकों के स्वागत में अगरबत्ती सुलगा रखी हो।बन्द गाड़ियों में बैठकर इसे महसूस नहीं किया जा सकता।वैसे आयुर्वेद में भी कुटज का खास इस्तेमाल किया जाता है। अतिसार, संग्रहणी जैसे पेट के रोगों में इसकी दवा को कारगर माना जाता है। कुटज घन वटी, कुटजारिष्ट इससे ही तैयार की जाती है।
और हां, बस्तर में पुराने समय में मित्रता कायम करने के लिए कुड़ई फूल का भी आश्रय लिया जाता था। इसे मीत बदना कहा जाता था। जिसे कुड़ई फूल बद लिया यानि मान लिया तो फिर दोनों आजीवन एक दूसरे को वास्तविक नाम से नहीं, बल्कि कुड़ई फूल कहकर संबोधित किया करते थे। ठीक उसी तरह, जैसे यहां कोदोमाली, डांडामाली, भोजली(जवारा) बदने की प्रथा प्रचलित थी।खैर, समय के साथ न तो ये उपमेय बाकी रहे, न ही उपमान। आधुनिकता की चकाचैंध ने ग्राम्य जीवन शैली को कोरोना की तरह संक्रमित जो कर दिया है।शहरीकरण की अंधी दौड़ में न तो कुड़ई फूल, कोदोमाली जैसे वनस्पति बाकी रह गए, बल्कि और भी ऐसे प्रतिमान लुप्त होते जा रहे हैं।

13 मार्च 2020

मछुआरे की ढूटी


मछुआरे की ढूटी......!

बस्तर में काष्ठकला का विस्तार इतना व्यापक है कि हम उसकी कल्पना भी नही कर सकते है। बस्तर में जनजातीय समाजों में रोजमर्रा की अधिकांश वस्तुयें लकड़ी या बांस से ही बनी होती है। घर में खाट से लेकर नदी में सफर के लिये नाव तक सभी लकड़ी की होती है। लकड़ी और बस्तर के आदिम जीवनचर्या का साथ सदियों पुराना है। बस्तर में जब ग्रामीण धर से निकलकर मछली पकड़ने के लिये नदी तालाब की ओर कुच करता है तो उसके हाथ में बांस से बना हुआ एक आकर्षक पात्र जरूर होता है। बांस से बना चैरस एवं गोलाकार पात्र डूटी या ढूटी कहलाता है। मछुआरे का ईनाम होती है उसके द्वारा पकड़ी गई मछलियां और वह अपने ईनाम को बेहद ही आकर्षक पात्र ढूटी मंे सुरक्षित रखता है। ढूटी मछुआरे द्वारा पकड़ी गई मछलियों को रखने का पात्र होता है जिसे हम अतिश्योक्तिपूर्व मछुआरे का संदूक कह सकते है। 

मार्ग मंे आते मछुआरे के हाथ में यदि ढूटी दिखाई पड़े तो समझ जाईये कि उसमें मछुआरे की मेहनत जरूर होगी। ढूटी का निचला हिस्सा प्लास्टिक के मटके के समान होता है जिसे बांस की पतली खपचियों को बुनकर बनाया जाता है वहीं उसका मुख बांस की पतली तिलियों से गोलाकार बनाया जाता है बिल्कुल मटके की तरह। पकड़ने के लिये दोनो सिरो पर रस्सियां बंधी होती है। तो यह कहानी थी मछुआरे के संदूक ढूटी की,,,, आप बताईये किस नाम से जानते है ? इस ढूटी को। 

5 मार्च 2020

बस्तर मे लूप्त प्रायः है नारंगी सेमल

बस्तर मे लूप्त प्रायः है नारंगी सेमल.....!

बस्तर मे बसंत की  बयार धीमे धीमे बह रही है। जंगलो में पत्तो की सरसाहट पतझड़ का बिगुल बजा रही है। चारो तरफ फैली महुए की मादकता रोम रोम को रोमांचित करने वाली है। टेसू के लाल दहकते फूलो ने जंगल में आग लगा दी है तो फिर भला सेमल क्यो पीछे रहे ? गुलाबी फूलो से लदे हुए सेमल के वृक्ष  राहगीरो को हर्षित करे रहे है। पत्ते विहिन सेमल पेड़ो पर खिले हुए गुलाबी पुष्प बसंत ऋतु की खुशियों में चार चांद लगा रहे है। 

बसंत .ऋतु में फूलो का राजा यदि कोई है  तो वह सेमल है। बस्तर में मुख्यतः दो रंगो के पुष्पों वाले सेमल पाये जाते है पहला है नारंगी और दुसरा गुलाबी। सेमल का एक तीसरा और प्रकार है वह पीला सेमल। बस्तर में अभी सर्वाधिक मात्रा में गुलाबी सेमल के वृक्ष बहुतायत मे देखने को मिलते है। नारंगी सेमल के वृक्ष बहुत कम      शेष है। 


नारंगी सेमल का एक वृक्ष दलपत सागर के किनारे स्थित है, वहीं कुछ वृक्ष गंगालूर के आसपास है। नारंगी सेमल पुष्प का रंग संतरे की तरफ नारंगी होता है। वृक्षों की अंधाधूंध कटाई के कारण यह नारंगी सेमल वृक्ष अब बस्तर में लूप्त प्रायः है। पीले रंग वाले सेमल पुष्प तो बस्तर में अभी तक देखने को नहीं मिला है। 

सेमल के वृक्ष से मेरी बचपन की यादे जुड़ी हुई है। इसके कांटो को तोड़कर सूपारी के रूप में खाया करते थे। इन कांटों का स्वाद भी सुपारी की तरह ही होता है। बहुत से मित्रो ने भी बचपन में सेमल के कांटे सुपारी के रूप में जरूर खाये होगे। 

9 जनवरी 2020

अड़गेड़ा

अड़गेड़ा...!


जी हाँ अड़गेड़ा.अड़ यानी कि आड़ा और गेड़ा यानी कि मोटा डंडा.जोहार एथनिक रिसोर्ट कोण्डागाँव में इसे देखकर बचपन याद आ गया।यहां इसे मुरिया जनजाति के घर के आँगन पर प्रदर्शित किया गया है.
पर कुछ समय तक घरों-घर अड़गेड़ा दखाई देता था.इसमें दो खंभे गड़े होते हैं.दोनों खंभों में बराबर ऊँचाई पर लगभग 5 से.मी. व्यास के गोल छेद बने होते हैं.इसकी संख्या 5 या 6 होती है.
दोनों खंभों के मध्य गेड़ा यानी कि मोटा डंडा फँसाकर गेट बंद किया जाता है.गेट खोलते समय गेड़ा को किनारे सरका दिया जाता है.बस्तर के छेर-छेरा पर्व में इससे संबंधित एक गीत भी गया जाता है।
पहली पंक्ति मैं भूल रहा हूं।आपको पता हो तो जरुर पूरा करिएगा.......... अड़गेड़ा हो अड़गेड़ा पावली अड़गेड़ा डेंगा दादा जाते रलो पावली अड़गेड़ा
अड़गेड़ा हो अड़गेड़ा पावली अड़गेड़ा।।


6 जनवरी 2020

छत्तीसगढ़ का एकमात्र नारियल विकास बोर्ड--कोपाबेड़ा कोंडागाँव

छत्तीसगढ़ का एकमात्र नारियल विकास बोर्ड--कोपाबेड़ा कोंडागाँव....!

कोंडागाँव से दक्षिण-पश्चिम दिशा में कोपाबेड़ा स्थित है,जो ऐतिहासिक शिवमंदिर के लिए तो प्रसिद्ध है ही साथ ही यहाँ स्थित नारियल विकास बोर्ड छत्तीसगढ़ प्रदेश का इकलौता नारियल विकास बोर्ड है.
छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश,और झारखंड राज्य के लिए नारियल की आपूर्ति यहीं से होती है.यहाँ 100 एकड़ के बगीचे में कुल 6000 नारियल के पेड़ लगे हैं.जिनके तनों पर काली मिर्च की की फलियाँ लटक रही हैं.
यहाँ 100 पौधेे कॉफी के हैं,जिनमें लाल-गुलाबी कॉफी के फल लटक रहे हैं.कुछ कामगार कॉफी के बीज धोते हुए दिखे.यहाँ 3000 पौधे कोको के हैं,यह कैडबरी चॉकलेट बनाने नें प्रयुक्त होता है.अनानास के भी 3000 पौधे हैं.

यहाँ नारियल-अनानास के पौध भी तैयार किए जाते हैं.पौधों के लिए ग्रीन हाउस बने हुए हैं.तेजपत्ते,नींबू,सिंदूर जैसे और भी कई पौधे हैं.यहाँ आपको केवल नारियल और नारियल के पौधे ही मिल सकते हैं.बड़ा ही सुन्दर बगीचा है.इस बगीचे के बीच से पक्की सड़क जाती है.
बगीचे के पीछे नारंगी नदी पत्थरों से टकराती हुई बहती है.यह जगह खड़क घाट कहलाता है,जोकि स्थानीय लोगों के लिए एक सुन्दर पिकनिक स्पॉट भी है.आजकल हल्के अँधेरे में नारियल के पेड़ों के बीच से छनकर आती सूरज की किरणें मन को मोह लेती है.
यहाँ के रंग-बिरंगे फूल खासकर सिंदूर,राइमुनिया और कागज़ के फूल तो आपसे बात ही करने लगेंगे.कोपाबेड़ा नारियल विकास बोर्ड कभी जरूर जाइएगा...
अशोक कुमार नेताम

3 जनवरी 2020

ऐतिहासिक धरोहर है रियासत कालीन बस्तर स्टांप

ऐतिहासिक धरोहर है रियासत कालीन बस्तर स्टांप......!

रियासत कालीन बस्तर में अपनी खुद की स्टांप भी चलती थी। इस बहुमूल्य स्टाम्प पर महारानी प्रफुल्ल कुमारी की तस्वीर अंकित है जिसमें नीचे बस्तर स्टेट लिखा है। यह स्टांप आठ आने का है। महारानी प्रफुल्ल कुमारी 1921 से 1936 तक बस्तर की प्रथम महिला शासिका रही है।

एक अन्य कोर्ट फी जिस पर जार्ज पंचम का चित्र अंकित है ,इसकी कीमत एक आना मात्र है.यह स्टांप केशरीयल महाजन को दिनांक 14.11.1934 को जारी की गई थी। इस स्टांप में जार्ज पंचम की चित्र लगी हुई हैं जिस पर बस्तर स्टेट लिखा हुआ है।
एक अन्य सामान्य स्टांप पर बस्तर स्टेट एवं माई दंतेश्वरी का सिंह पर सवार चित्र बना हुआ है। अंग्रेजी में श्री दंतेश्वरी माई लिखा हुआ है। इसका मूल्य भी एक रूपया था।
एक स्टांप का मूल्य एक रूपये का है। जिसे आठ भाषाओ में लिखा हुआ है। इस पर जार्ज षष्ठम का चित्र अंकित है।
बस्तर स्टेट की ऐतिहासिक स्टांपो की फोटो भेजी है कबि चंद्रा महंता ने। कबि चंद्र महंता जी राउरकेला ओडिसा के निवासी है। उन्हें स्टांप और सिक्कों के कलेक्शन का शौक है।
अपने बहुमूल्य कलेक्शन से उन्होने बस्तर स्टेट की स्टांप की तस्वीर भेजी है। इस बहुमूल्य धरोहर को संग्रहित करने एवं चित्र भेजने के लिये महंता जी का दिल से बहुत बहुत आभार ।
ओम!





2 जनवरी 2020

बस्तर में अब नहीं बनते है मिट्टी के दो मंजिले मकान

बस्तर में अब नहीं बनते है मिट्टी के दो मंजिले मकान....!

अपना घर सभी को प्यारा होता है। भले ही वह आलीशान हो या एक साधारण सी झोपड़ी। देश काल की परिस्थिति के अनुसार अलग अलग क्षेत्रों में घरों की बनावट और और उसमें प्रयुक्त सामग्री में भिन्नता दिखाई पड़ती है। साधारणतया घरों का आकार प्रकार एवं घर बनाने की सामग्री का चयन मौसम की अनुकूलता के हिसाब से तय होता रहा है।
किन्तु समय के साथ घर बनाने की तकनीक और सामग्री में अब बहुत परिवर्तन आ चुका है। प्रारंभ में लकड़ी से होते हुए मिट्टी और आज सीमेंट इंटों से बने पक्के मकानों का जमाना है। घरों के निर्माण और उनके बनावट में आमूल चूल परिवर्तन से बस्तर भी अछूता नहीें है।

बस्तर के अंदरूनी गांवों में पहले लकड़ी और मिट्टी से बने घर देखने को मिलते थे वहीं अब पक्के मकान बनने लग गये है। कुछ गांवों में मिट्टी से बने मकान आज भी देखने को मिलते है। ये घर प्रायः दो या तीन कमरों के ही होते है।
बिना चार दिवारी का लकड़ी के खंबो पर टिका एक कमरा घर का प्रमुख हिस्सा होता है। जिसमें प्रायः घरेलू कार्य निपटाये जाते है। बस्तर के गांवों में लगभग सभी जगह एक मंजिला घर ही देखने को मिलता है। कुछ प्रमुख जगहों पर प्रतिष्ठित लोगों का घर दो मंजिला होता था।
मिटटी से बने हुए ऐसे दो मंजिले घर अब बस्तर में बहुत ही कम देखने को मिलते है। इन दुमंजिला मिटटी के मकानों की जगह अब पक्के आलीशान बहुमंजिला घरों ने ले ली है।
दंतेवाड़ा के पास बालूद में मिट्टी से बना हुआ दो मंजिला घर आज भी स्थित है। इस मकान की दीवारे पूर्णतः मिट्टी की बनी हुई है। ये दीवारे काफी मोटी है। बीच में लकड़ी का पाटेशन तैयार कर इसे दो मंजिला बनाया गया है। ऐसे मकान सिर्फ संपन्न लोगों या इलाके के मुख्य व्यक्ति के ही होते थे।
वैसे यह मकान अब काफी पुराना एवं जर्जर हो चुका है। मिट्टी से बने ऐसे दो मंजिले मकान बनाने का यह तरीका बस्तर में अब चलन में नही रहा। कुछ सालों में शायद यह मकान भी सिर्फ तस्वीरों में रह जायेगा।

23 दिसंबर 2019

छिन्द कीड़ा का स्वादिष्ट व्यंजन

छिन्द कीड़ा का स्वादिष्ट व्यंजन ......!
बस्तर ने जहाँ कई विविधताओ को अपने अन्दर समेटे रखा है वही यहाँ की लोककला,संस्कृति ,रहन-सहन और खान-पान भी अपने में बेमिसाल है| बस्तर की पहाड़ी इलाको में मिलने वाले बौने छिंद के पौधे भी कई तरह से ग्रामीणों के आय के स्रोत है!
बाजारों में जहाँ छोटे छिंद की काफी मांग है वही इसके जड़ो में पाये जाने वाले लार्वा को भी खाने के तौर पर उपयोग में लाया जाता है |
इस छिंद के कीड़े का वैज्ञानिक नाम rhynchophorus ferrugineus है वही बस्तर में इसे इंद पुण्क कहा जाता है | इस कीड़े का जीवन चक्र ग्रीष्म ऋतू में देखने को मिलता है | किस पौधे में यह कीड़ा है इसके बारे में पता लगाने के लिये ग्रामीण पौधो के बीच कोमल पत्तियों को देखकर पता कर लेते है कि कहाँ लार्वा की उपस्थिति है.

दरअसल जिस पौधे में कीड़ा होता है उसके बीच के कोमल पत्ते मुरझा जाते है और फिर उस पौधे को जमीन से खोद कर छिंद कीड़े को बाहर लाया जाता है | छिंद कीड़े के लार्वा की लम्बाई तक़रीबन 6 से 7 सेंटीमीटर होती है | इसे अपने जीवन चक्र को पूर्ण करने के लिये लगभग 7 से 10 सप्ताह का समय लगता है |
पहले अन्डो से लार्वा बनता है फिर यही लार्वा थोड़ी बड़ी होकर जड़ो से बाहर आकर अपने लिये उसी छिंद के पौधो की रेशो से प्यूपल केस बनाती है फिर प्यूपा का निर्माण होता है तदोपरांत एक वयस्क कीड़े का निर्माण होता है | कीड़े की प्रारंभिक और अंतिम दोनों अवस्था काम में आती है | प्रारंभिक अवस्था लार्वा जहाँ तेल में तल कर खाने में उपयोग किया जाता है वही अंतिम अवस्था बच्चो के मनोरंजन के साधन के तौर पर भी उपयोग में लाया जाता है |
परिपक्व कीड़े के सामने बने सुड की तरह दिखने वाले नाल भाग में छिंद के काँटे को लगाया जाता है फिर उसे फिरकी घुमा कर रोक लिया जाता है कीड़े की उड़ने की आवाज छोटे बच्चो को ख़ुशी की अनुभूति देती है |
जिस तरह बस्तर में छोटे छिंद के लार्वा को स्वादिष्ट और पौष्टिक माना जाता है वही दुनिया के कई हिस्सों में भी कोकोनट लार्वा और डेड पाम के लार्वा को खाने में उपयोग में लाया जाता है |

पोस्ट साभार चन्द्रा मण्डावी जी
टोरा तेल मे भूनकर नमक मिर्च सहित क्रन्ची बनाकर कड़ कड़ की आवाज करते हुए खा सकते हैं

17 दिसंबर 2019

शालवनों का द्वीप : बस्तर की एक और छवि

शालवनों का द्वीप : बस्तर की एक और छवि
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बस्तर अपने दुर्गम भौगोलिक स्थिति और आदिम जनजातीय संस्कृति के कारण बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मानवशास्त्रियों के आकर्षण और अध्ययन का केंद्र रहा है। ग्रियर्सन का 'माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर' के बाद वेरियर एल्विन का 'मुरिया एंड देयर घोटुल' विश्व प्रसिद्ध हुआ।यों इनके पूर्व और बाद भी स्थानीय साहित्यकारों, भाषाशास्त्रियों द्वारा अध्ययन होते रहे हैं। शानी जी इस क्षेत्र से चर्चित कथाकार हुए हैं; जिनका हिंदी कथा जगत में अपना विशिष्ट स्थान है।किसी भी कथाकार की तरह वे भी अपने कहानियों में अपने परिवेश को चित्रित करते रहे हैं।
मगर 'शालवनों का द्वीप' एक अलग तरह की कृति है। यह उपन्यास नही है मगर इसको पढ़ते समय उपन्यास का अहसास होता है।यह तटस्थ यात्रा विवरण भी नही है। यह एक तरह से जनजातियों के बीच रहते हुए; उनके जीवन व्यापारों को देखते, उनके सुख-दुख,पीड़ा, आनन्द से एक कथाकार और सम्वेदनशील व्यक्ति का संवेदनात्मक जुड़ाव है। इस जुड़ाव में आत्मालोचन भी और स्थिति को न बदल सकने की बेबसी की छटपटाहट भी है। चूंकि चित्रण एक कथाकर ने किया है, इसलिए इसमे कथारस भी है।
इस अनुभाविक चित्रण का आधार बस्तर में मानवशास्त्रीय अध्ययन के लिए आये अमेरिकन युवा शोधार्थी जे.जे. एडवर्ड और उनकी पत्नी फिलिस के साथ लेखक द्वारा बस्तर के 'ओरछा' में बिताये दो माह का समय है।इस दौरान लेखक ने उन चरित्रों और घटनाओं को करीब से देखा है, जो इस पुस्तक में चित्रित है। यद्यपि यह समाजशास्त्रीय अथवा मानवशास्त्रीयअध्ययन नही है तथापि इसमे जनजातियों के संस्कृति, कर्मकांड और लोकाचार का चित्रण है। श्री एडवर्ड ने भूमिका में उचित ही लिखा है " श्री शानी की यह रचना शायद उपन्यास नही, एक अत्यंत सूक्ष्म संवेदनायुक्त सृजनात्मक विवरण है जो एक अर्थ में भले ही समाजविज्ञान न हो लेकिन दूसरे अर्थ में यह समाजविज्ञान से आगे की रचना है"।

जे.जे. एडवर्ड साठ के दशक के शुरूआत में बस्तर में शोध के लिए आये थे। उन्होंने लगभग दो वर्ष बस्तर के 'ओरछा' में रहकर अपना शोधकार्य किया था।इस अध्ययन के सिलसिले में ही शानी से उनका सम्पर्क हुआ और उनमे मित्रता हुई। शानी जी ने इस पुस्तक में एडवर्ड दम्पत्ति की सहजता, आदिवासियों से प्रेम, मानवीयता, सम्वेदनशीलता की जगह-जगह प्रशंसा की है।एडवर्ड जनजातियों के लिए अध्ययनकर्ता से अधिक सहयोगी थे।वे उनकी कई तरह से सहयोग करते थें जिसमे चिकित्सकीय सहयोग का मार्मिक चित्रण है,जबकि वे चिकित्सक नही थे।उनकी पत्नी भी अपनी सहजता और मानवीयता के कारण जनजातियों के प्रेम की भागी थी। एडवर्ड की सहजता कई बार शानी जी को आत्मालोचन के लिए विवश कर देती थी मसलन एक घटना में एडवर्ड ने आश्चर्य व्यक्त किया की यहां(भारत में) थोड़ा भी धनाड्य होने पर लोग अपना छोटा-छोटा काम भी स्वयं न कर नौकर से कराते हैं, जबकि अमेरिका में ठीक इसका उल्टा होता है। वहां ऐसे लोग बेचारे अपाहिज समझे जाते हैं, जिन पर समाज तरस खाता है। जाहिर है ऐसी प्रदर्शनप्रियता को समाज के लिए सकारात्मक नही माना जा सकता। एक अन्य जगह एडवर्ड को गंभीर रोगों से ग्रस्त लोगों की चिकित्सा सहजता से करते देख लेखक को अपनी स्थिति का अहसास होता है।
इस रचना में यह भी देखा जा सकता है कि जनजातीय समाज को केवल रोमेंटिक ढंग से देखने वालों का दावा कितना खोखला रहा है। कुछ लोगों को जनजातियों का केवल नृत्य-गीत -संगीत भर दिखाई देता है; उनके जीवन संघर्ष नही। मानो वे किसी अलौकिक दुनिया में रहते हैं और उन्हें भूख प्यास नही लगती। शानी जी ने दिखाया है कि किस कदर उस क्षेत्र में भूख-गरीबी-बीमारी का आतंक है। वहां अधिकांश लोगों के लिए दो जून की रोटी जुटा लेना ही उपलब्धि रहा है।केय, रेको, लाली के जीवन की विडम्बना में इसे देखा जा सकता है। तपेदिक से मर रहे 'लाली' का प्रसंग बेहद मार्मिक है।इसी तरह 'कोसी' की उन्मुक्त हँसी जितना आकर्षित करती है; बाघ द्वारा उसका मारा जाना एक कसक पैदा कर देती है।
मुड़िया जनजाति का 'घोटूल' चर्चित रहा है। देखा जाय तो यह वेरियर एल्विन के शोध के बाद अधिक चर्चा में आया। एल्विन ने घोटुल के उन्मुक्त यौन सम्बन्धो और उसके नियमन पर काफी लिखा है; जिसका कुछ लोग आलोचना भी करते हैं। हालांकि 'मुरिया एंड देयर घोटुल' में केवल यौन प्रसंग नही अपितु मुरिया जनजाति का सम्पूर्ण अध्ययन है।एल्विन के दृष्टिकोण या अध्ययन के बलाघात से कोई असहमत हो सकता है मगर चालीस के दशक में घोटुल के यौन उन्मुक्तता से इंकार नही किया जा सकता।यह जीवन राग का उल्लास रहा है। नैतिक-अनैतिक समय और समाज सापेक्ष होते हैं। इस कृति में शानी जी ने 'घोटुल' का जो चित्रण किया है इससे इस बात की पुष्टि होती है।मगर यह बताने की आवश्यकता नही की घोटुल संस्कृति-शिक्षा का केंद्र भी रहा है। शानी ने लिखा भी है "यह भी एक पहलू है, मैने सोचा- लेकिन केवल यही सबसे ज़्यादा हमारी दृष्टि की मांग करता हो, ऐसा भी नही है।"
समय बदल रहा है। बस्तर ने भी पिछले पचास-साठ सालों में बदलाव आया है। अब अब वहां आवागमन कठिन नही रह गया है। बाज़ारवाद और नगरीकरण के प्रभाव से जनजातीय संस्कृति में भी काफी बदलाव आया है।घोटुल अब विलुप्त प्राय हैं; जो हैं केवल औपचारिक भर रह गए हैं। लेकिन बस्तर की खुशहाली को जैसे ग्रहण लगा हुआ है। समस्याएं खत्म ही नही होती। आज नक्सलवाद, जल-जंगल-ज़मीन से बेदखली,पर्यावरण की समस्याएं मुह बाये खड़ी हैं।ऐसे में 'शाल वनों का द्वीप' जैसी कृतियां और उनके चरित्र और सिद्दत से याद आते हैं।क्या बस्तर की वह उन्मुक्त हँसी वापस आयेगी?
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#अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छ.ग.)
मो. 9893728320

23 अगस्त 2019

लकड़ी के पुल

लकड़ी के पुल.....!

अत्यधिक वर्षा के कारण बस्तर की नदी नालो मे साल भर पानी रहता है. भौगोलिक स्थिति बेहद दुरुह होने एवं सदानीरा होने के कारण आज भी मार्गो मे आने वाले नदी नालो पर पुल नहीं बने हुए हैं जिससे ग्रामीणो को कठिनाईयो का सामना करना पड़ता है. आज आधुनिक युग मे बस्तर मे जहाँ तक पहुंच हुई वहाँ वहाँ नदी नालो पर छोटे बड़े पुल बन चुके हैं.
वही हम लगभग आज से दो सौ तीन सौ साल पीछे के बस्तर के आवागमन मार्गो का इतिहास देखते हैं तब लगता है कि यहां नदी नालो को पार करने का सिर्फ़ एक ही साधन रहा होगा वह है सिर्फ़ छोटी नावे... और आज भी सिर्फ़ यही विकल्प ही दिखता है.

हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि यहां ग्रामीणो ने नदियो पर लकड़ी के पुल शायद ही बनाये होगे किन्तु अबुझमाड मे एक नदी पर बना यह पुल अबुझमाडियो के परम्परागत इंजीनियरिग कौशल का जीवन्त उदाहरण हैं. इस लकड़ी के पुल के पिल्लर बेहद मजबूत है जैसे किले के कोई बुर्ज हो. उपर पैदल या सायकिल से आराम से निकला जा सकता है.
वही इन्द्रावती पर यह लकड़ी का छोटा पुल भी बेहद मजबूत है जिस पर दोपहिया वाहन भी बड़ी आसानी से निकल जाती है. अंग्रेजी इंजीनियरो जिन्होंने यहाँ के नदियो पर मजबूत पुलो का निर्माण किया उनसे ज्यादा कुशल यहाँ के ग्रामीण है. जिसका प्रमाण लकड़ी के ये पुल है.
बस्तर मे राजा रुद्रप्रताप देव के शासनकाल मे लगभग 120 साल पहले प्लम्बली ने भी बस्तर मे लकड़ी के पुलो का निर्माण किया. उन्होंने लकड़ी के इतने मजबूत पुल बनाये थे जिस पर बड़े बड़े ट्रक आसानी से निकल जाते थे. उस समय पुरे बस्तर मे लगभग 1500 सौ लकड़ी के पुल बनाये गये थे.
ओम!

13 मई 2019

मोहरी का मोह

मोहरी का मोह....!

बस्तर के परंपरागत वाद्य यंत्रो मे मोहरी बाजा का अपना विशेष स्थान है. कोई भी शुभ काम मोहरी बाजा के बिना पुरा नही होता है. मोहरी और नगाड़े की मस्त धुनो का अद्भुत संगम ही मोहरी बाजा है.

मोहरी एक तरह से शहनाई का ही प्रकार है. बांस की खोखली नली मे बांसुरी की तरह ही सात छिद्र होते हैं. सामने पीतल का बना गोलाकार मुख लगा होता है. इस पर देवी देवताओ को समर्पित पवित्र चिन्हो जैसे पदचिन्ह, सुर्य, चान्द, नाग का अंकन रहता है. मोहरी के पीछे ताड पत्रो से बनी फ़ुकनी लगी होती है.

मोहरी की मधुर ध्वनि से देवगुड़ी का वातावरण भक्तिमय हो जाता है. मोहरी के कर्ण प्रिय धुनो का मोह छुटे नहीं छुटता...एक बार सुन ले तो बार बार सुनने की इच्छा होती है. शादी ब्याह मे मोहरी बाजा की मधुर धुने, पैरो को थिरकने को विवश कर देती है. नृत्य के कदम मोहरी के सुरो के साथ ताल से ताल मिलाकर थिरकते है. मोहरी और नगाड़े की जुगल बन्दी पुरे तन मे असीम उत्साह का संचार कर देती है.

मोहरी बजाना भी कोई आसान काम नहीं है. इसके लिये लम्बी और गहरी स्वासो की जरूरत पड़ती है. फ़ेफडो़ का मजबूत होना बेहद जरुरी है. मोहरी बाजा बजाने वाले माहरा जाति से होते हैं. पूजापाठ, शादी ब्याह मे मोहरी बाजा बजाने का काम माहरा जाति के ही लोग करते है. ये इनका पैतृक और सदियों पुराना काम है.

27 अप्रैल 2019

नंदिनी की दोस्त अबाबील

नंदिनी की दोस्त अबाबील...!
परसो की बात है एक परिचित सज्जन मेरे घर मे एक घायल चिड़िया छोड़ कर चले गये. उन्हें यह चिड़िया सडक पर घायल मिली थी. यह चिड़िया अबाबील है जो कि घरो की दिवारो मे मिट्टी के घोसले बनाती है. दरअसल यह अबाबील घायल ना होकर बीमार और डरी हुई थी.


घर मे हमने इस चिड़िया को पानी पिलाया फ़िर भी यह उड़ नहीं रही थी. हमने इसे एक प्लास्टिक के खाली टोकने मे ऐसे ही खुला रख दिया फ़िर भी उसने एक बार भी उड़ने की कोशिश नहीं की. बेहद ही डरी हुई सहमी सी इस चिड़िया को मेरी चार साल की बेटी नंदिनी ने बहुत खिलाया.
इसका बहुत ध्यान रखा. लगभग दो दिन तक यह अबाबील उसी टोकनी मे पड़ी रही. हमने तो उसके जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी. शायद उसे बुखार था. दुसरे दिन उसका बुखार कम हुआ. अब उसे देखने से लगने लगा अब यह थोड़ी ठीक हो रही है. दुसरे दिन उसने अपने आप एक छोटी सी उड़ान भरी लेकिन वह गिर पडी. फ़िर थोड़ी देर बाद उसने पुरी ताकत से उड़ान भरी और वह फ़ुर्र से आसमान मे उड़ गयी. उस समय नंदिनी सो रही थी.

उसने जागते ही यही पुछा कि मेरी चिड़िया कहाँ है? जब उसे पता चला कि वह उड़ गई तो बहुत रोई किन्तु जब उसे समझाया कि वह अपने माँ के पास गयी है तो नंदिनी समझ गयी और मान भी गयी. शायद अबाबील को बुखार थी. बुखार दुर होते ही उसने फ़िर से आसमान मे उड़ान भर ली.

25 अप्रैल 2019

माडम सिल्ली डेम के साईफन सिद्धांत पर काम करता जादुई दिया

जादुई दिये के पीछे दाबलंघिका का सिद्धांत.....!

धमतरी के माडम सिल्ली डेम के साईफन सिद्धांत पर काम करता है यह दिया। 

कल हेमंत वैष्णव जी द्वारा जादुई दिये की दी गई संक्षिप्त जानकारी पोस्ट की थी जिसे बहुत से लोगों ने पसंद किया और साझा किया। मिटटी का बना यह दिया दो हिस्सों में है जिसमें नीचे का हिस्सा एक गोलाकार आधार के साथ दिया है जिसमें बत्ती लगायी जाती है। दुसरा हिस्सा चाय की केतली की तरह ही एक गोलाकार छोटी सी मटकी का पात्र है जिसमें तेल भरा जाता है। तेल निकलने के लिये मिटटी की नलकी इसमें बनाई गई है। इस गोलाकार पात्र में तेल भरकर दिये वाले आधार के उपर उल्टा कर सांचे मे फीट कर दिया जाता है। 


इसे इस तरह से उल्टा फीट किया जाता है कि तेल निकलने वाली नलकी ठीक दीये के उपर रहती है और उसमें से अपने आप तेल निकलकर दिये में दिये में भर जाता है और दीये में तेल भरने के बाद इसमें से तेल निकलना अपने आप बंद हो जाता है। यह बात बेहद ही आश्चर्य जनक लगती है कि जब उसमें पुरी तरह से तेल भरा हुआ है तो दीपक में तेल भरने के बाद तेल निकलना अपने आप कैसे बंद हो जाता है। यह एक तरह से जादू ही है। इसलिये इस दिये को बनाने वाले श्री अशोक चक्रधारी जी ने इसे जादुई दिया का नाम दिया है। 

हमारी भारतीय सभ्यता में ऐसी अनेकों प्राचीन विधियां ग्रंथो में उल्लेखित है जिससे आज की पीढ़ी तो लगभग भूल चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों खासकर बस्तर में भले यहां के लोगों ने प्राचीन ग्रंथ नहीं पढ़े है किन्तु इन्हें ये विधियां इन्हे सदियों से ज्ञात है। विरासत से ये विधियां आज भी बस्तर में जीवित है। जिसका उदाहरण अशोक चक्रधारी जी द्वारा बनाया गया यह दिया है। 


इस दिये में तेल भर जाने के बाद अपने आप तेल बंद हो जाने के पीछे विज्ञान का भौतिकी सिद्धांत काम करता है। भौतिकी के इस सिद्धांत में हवा का दबाव दीये में तेल भरने और बंद करने को संचालित करता है।  यह दिया भी माडमसिल्ली डेम धमतरी का पानी छोड़ने का साईफन सिस्टम जैसा ही आधारित है। इस दिये में अंदर की तरफ एक छिद्र  है। इस छिद्र से हवा अंदर जाकर उपर भरे हुए गोलाकर पात्र मे उपर की दबाव बनाने का कार्य करती है। जब दिया पुरी तरह तेल से भर जाता है वह छिद्र भी तेल से भरा रहता है। तेल जैसे उस छिद्र से कम होकर नीचे आता है तो पुनः उसमें हवा अंदर की ओर प्रवेश करती है और उपर लगे गोलाकार पात्र में तेल की ओर दबाव बनाता है और जितनी हवा अंदर जाती है उतना तेल फिर से दिये में गिरने लग जाता है। 

माडम सिल्ली अंग्रेजों के जमाने का बनाया हुआ डेम है जिसमें साईफन सिस्टम कार्य करता है। साईफन सिस्टम के बारे में विकीपीडिया से भी कुछ जानकारी प्राप्त होती है। विकीपीडिया के मुताबिक दाबलंधिका वा साइफन  न्यून कोण पर मुड़ी हुई नली के रूप का एक यंत्र होता है, जिससे तरल पदार्थ एक पात्र से दूसरे में तथा नीचे स्तर में पहुँचाया जाता है।

साइफन की क्रिया पूर्वोक्त नली के दोनों सिरों पर दाब के अंतर के कारण होती है और जब पात्र खाली हो जाता है, या दोनों पात्रों में तरल पदार्थ का स्तर समान हो जाता है, तब बहाव रुक जाता है। इस यंत्र के द्वारा बीच में आनेवाली ऊँची रुकावटों के पार भी तरल पदार्थ, शक्ति का व्यय किए बिना, भेजा जा सकता है। साधारण साइफन की नली को स्थानांतरित किए जानेवाले तरल पदार्थ से भर दिया जाता है और उसके लंबे अंग के सिरे को अंगुली से बंद कर, छोटी बाँह के सिरे को तरल पदार्थ में डुबा और लंबी बाँह के सिरे को दूसरे पात्र में कर, अंगुली हटा लेते हैं। तरल पदार्थ का दूसरे पात्र में बहना अपने आप आरंभ हो जाता है। ऐसे साइफन को प्रयोग से पहले प्रत्येक बार भरना आवश्यक होता है।


साइफन लॉक (ताला)

विविध उपयोगों के लिए इस यंत्र के अनेक रूप प्रचलित हैं। कुछ में नली को भरने के, या उसे भरे (और इस प्रकार आवश्यकता होने पर स्वयं चालू होने योग्य बनाए) रखने के, उपकरण हाते हैं। साइफन के सिद्धांत पर काम करनेवाले नलों से बहुधा जल को पहाड़ियों या टीलों पर, ऊँची नीची भूमि से होते हुए, किसी घाटी के पार पहुँचाने का काम लिया जाता है। ऐसे साइफनों में टीले या ऊँचाई पर स्थित नल में फँसी हुई वायु के निकास के लिए एक वाल्व का होना आवश्यक है। सोडावटर से भरे हुए बर्तनों में स उसे निकालने के लिए जो साइफन लगाए जाते हैं उनकी नली में एक स्प्रिंग वाल्व लगा रहता है, जो एक लीवन दबाने पर खुल जाता है और सोडावाटर की गैस के दबाव से जल बाहर निकल आता है।
                                              https://youtu.be/DRoLBokz0Vo

अशोक चक्रधारी जी कोंडागांव के बेहद ही सम्मानित हस्तशिल्पकलाकार है। कुम्हारपारा में रहने वाले अशोक चक्रधारी जी ने अपनी इन्ही कला के बदौलत देश विदेश में कई पुरस्कार जीते है। यह जादुई दिया भी अशोक चक्रधारी जी ने ही बनाया है। उनका बहुत बहुतआभार ।  जादुई दिया और उसी सिद्धांत पर काम करने वाले एक अन्य उपकरण का फोटो वीडियो और रेखाचित्र शेयर किया और साथ मुझे इस दिये के पीछे के भौतिकी के सिद्धांत को समझने में बहुत मदद की। जानकार मित्र इस दिये से जुड़ी जानकारी और वैज्ञानिक सिद्धंात की जानकारी जरूर शेयर करे।  यदि आप में से किसी को यह दिया चाहिये तो आप कोंडागांव के कुम्हार पारा में अशोक चक्रधारी जी से मुलाकात कर दिया ले सकते है।  

आलेख ओम सोनी दंतेवाड़ा

14 फ़रवरी 2019

बस्तर के जंगलों में आज भी महक रही है पारसी जोड़े की अनोखी प्रेम कहानी

           बस्तर के जंगलों में आज भी महक रही है पारसी जोड़े की अनोखी प्रेम कहानी....!

बस्तर की धरती अपने अंदर कई रहस्यों को छिपाये हुये है। यहां के हर कोने में ऐसी बहुत सी रोमांचक कहानियां छिपी पड़ी है जो आज भी दुनिया के सामने आने को शेष है। आजादी के दिनों से घटित हुआ ऐसा ही एक किस्सा है जिसमें रोमांच के साथ साथ एक महिला द्वारा अपने दिवंगत पति के प्रति अटूट प्रेम की अनोखी दास्तान है।
मित्र राजकुमार

बस्तर की पहचान आज ऐसी बनी हुई कि यहां के वातावरण में सिर्फ बारूद की ही गंध आती है किन्तु इसके किसी कोने में आज भी प्रेम की महक है जिसके भीनी खुश्बु के आगे बारूद की गंध फीकी पड़ जाती है। आनंदित कर देने वाली प्रेम की ऐसी ही एक महक आज भी कुटरू नगर की इस समाधि से निकलती है।

बस्तर के सुदूर दक्षिण का क्षेत्र आज दक्षिण बस्तर के नाम से जाना जाता है। इसका एक जिला बीजापुर है जो कि घने वनों से आच्छादित एवं विरल आबादी क्षेत्र है। इसी बीजापुर के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में कुटरू नाम का छोटा सा ग्राम है। कुटरू रियासत काल में बस्तर की सबसे बड़ी जमींदारी रही है। इस क्षेत्र की अन्य खासियत यहां पाये जाने वाले जंगली भैंसे है जिनका रियासतकाल में अंधाधुंध शिकार किया गया। 

पेस्टन जी 1948

यह क्षेत्रों अंग्रेजों की पसंदीदा शिकार गाह थी। यहां के मैदानों में पाये जाने वाले सुडौल जंगली भैंसों के शिकार के लिये शिकारी लालायित रहते थे। ऐसे ही एक पारसी शिकारी पेस्टन जी की गुमनाम समाधि आज भी कुटरू में मौजूद है। इस समाधि के पीछे एक पुरानी प्रेम कहानी को जानकर मन बेहद ही रोमांचित हो जाता है। 

समाधि

बात 1948 के दिनों की है। पेस्टनजी नौरोजी मुंबई के एक व्यापारी थे। जंगली भैंसे के शिकार की चाह ने उन्हें बस्तर खींच लाई। वे जंगली भैंसो की शिकार के लिये बीजापुर के कुटरू आ पहुंचे। यहां शिकार के दौरान एक घायल जंगली भैंसे ने पेस्टनजी को अपने खुरों और सींगों से रौंदकर मार डाला। 

वैसे यह एक सामान्य ही घटना मात्र लगती है आम तौर पर यह होता भी है कि कभी कभी शिकारी खुद शिकार बन जाता है। किन्तु इनकी मृत्यु के बाद इनकी पत्नि ने कुटरू में ही इनकी कब्र बनवाकर प्रेम की नयी इबारत लिखी। कुटरू के लोग कहते है कि पेस्टन जी की पत्नि जब तक जीवित रही तब तक वह पूण्यतिथी के दिन अपने पति के कब्र पर पुष्प एवं दिये जलाने की राशि डाक द्वारा भेजती रही। बस्तर में जंगलो में सत्तर साल पुरानी प्रेम कहानी की महक आज भी इस समाधि के पास महसूस की जा सकती है।

OM SONI DANTEWADA

8 फ़रवरी 2019

मुकड़ी मावली के दरबार में होती है प्रेमियों की ईच्छा पुरी

मुकड़ी मावली के दरबार में होती है प्रेमियों की ईच्छा पुरी


प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है की उसे उसका मनचाहा जीवनसाथी मिले परन्तु हर व्यक्ति की यह इच्छा पूरी नहीं होती है। कुछ खुशनसीब होते है जिन्हे उनके मनपसंद जीवनसाथी मिल जाते है। हर प्रेमी जोड़े की ख्वाहिश होती है कि उनका प्रेम अमर रहे, वो दोनों हमेशा साथ रहे। 

परन्तु विभिन्न कारणों से प्रेमी प्रेमिका साथ नही रह पाते है। उनका प्रेम अधूरा रह जाता है। बहुत से प्रेमी प्रेमिका अपने विवाह के लिए विभिन्न तरह के मनौतियां मांगते है। कई तरह के टोटके करते है। मंदिरो में भगवान से प्रार्थना करते है। दंतेवाड़ा में मुकड़ी मावली के समक्ष मांगी गई विनती जरूर पुरी होती है। 

दंतेवाड़ा जिले के छिंदनार ग्राम में प्रचलित एक मान्यता के अनुसार हर वर्ष कई प्रेमी अपने मनवांछित प्रेमिका से विवाह करने के मुकड़ी मावली माता के मंदिर आते है। अपनी प्रेमिका या चहेती लड़की से शादी करने के लिए यहां प्रचलित मान्यता अनुसार उसके बाल या कपडे को पत्थर के नीचे दबाकर रखा जाता है और देवी से बिना रूकावट शादी कराने का निवेदन करते है।

 देवी के शक्ति से नहीं चाहने वाले लड़की तथा उसके परिजनों का विचार बदल जाता है और वे शादी के लिए तैयार हो जाते है। ऐसे सफल प्रेमी हर साल जून में आयोजित जात्रा में आकर देवी को अपनी भेंट चढ़ाते है। इस मंदिर में महिलाओ का जाना वर्जित है।

गीदम से बारसूर मार्ग में स्थित हीरानार से बायीं ओर १७ की. मी. की दुरी पर छिंदनार ग्राम है। इस  छिंदनार ग्राम से बारसूर जाने वाले मार्ग में लगभग चार किलोमीटर की दुरी पर पहाड़ी के नीचे  सैकड़ो वर्ष पुराना एक छोटा सा मंदिर स्थित है। मंदिर काले पत्थर के शिलाओं से निर्मित है। मंदिर में मुकड़ी मावली माता की प्रतिमा स्थापित है। घने जंगलों के मध्य स्थित यह जगह काफी रोमांचकारी है।  किसी जानकार व्यक्ति के साथ यहाँ जा सकते है।

10 जनवरी 2019

लुप्त होते बस्तर के बैल बाजार


बस्तर के हाट बाजार किसी भी सैलानी के लिये आकर्षण के केन्द्र होते है। हाट बाजार बस्तर की आदिम संस्कृति को करीब से देखने का सबसे अच्छा माध्यम है। सब्जियों, रोजमर्रा की चीजों , एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं के हाट बाजारों के अलावा बस्तर के कुछ खास स्थानो में पशुओ का बाजार भी सजता है। व्यापारिक नगरी गीदम दक्षिण बस्तर का महत्वपूर्ण केन्द्र बिन्दु है। गीदम में आज भी बुधवार के दिन पशुओं को बाजार भरता है। यहां पशुओं से मतलब बैल, गाय की बाछियां, या पाढ़े से ही है। बाकि जानवरों का इस बाजार कोई लेना देना ही नहीं है। इसलिये यहां पुरे बस्तर में ऐसे पशु बाजारों को बैला बाजार ही कहते है।



बैल बाजार में अप्रैल से लेकर जून माह तक काफी रौनक रहती है अर्थात पशुओं की संख्या इन महिने में ज्यादा रहती है। इन बैल बाजारों में आदिवासी गाय की बाछियां, बैल, और पाढ़े खरीदने और बेचने के लिये आते है। आषाढ़ में नागर जोतने से पूर्व यहां के आदिवासी किसानों को बैल की जरूरत पड़ती है। इन बैल बाजारों से नागर जोतने के लिये आसानी से बैल या पाढ़े मिल जाते है। बस्तर में कई अंदरूनी गांवो में अब भी टै्रक्टर की पहुंच ना के बराबर है। 



इसलिये वे अंदर गांव के किसान नागर जोतने के लिये इन पशुओं पर ही निर्भर है। बस्तर में गाय की बड़ी बाछियों एवं गाय से भी नागर जोते जाते है। यहां गाय बैलों एवं भैसे की नस्ले बेहद निम्न स्तर की है। आदिवासी गाय भैंसो से दुध नहीं निकालते है। यहां की स्थानीय राउत जाति ही दुध निकालने का कार्य करती है। लगभग प्रत्येक आदिवासी के घर में गाय भैंस होते है। 


गरीब से गरीब धर में भी 100-50 मवेशी होते ही है। पैसों की जरूरत या फिर अधिक पशु होने के कारण इन बैल बाजारों में आदिवासी धर के मवेशी बेचने के लिये लाते है। कुछ आदिवासियों ने इसे अपना रोजगार भी बना लिया है। ये लोग उड़िसा के उमरकोट, कालाहांडी से सस्ते दामों में पशु खरीद कर बस्तर के इन बैल बाजारों में बेचने के लिये लाते है। इन्हें कुछ पैसों का फायदा हो जाता है। इतनी दुर से मवेशियों को पैदल ही लाते है। अपने गांवों से भी बाजार तक ये पैदल ही मवेशियों को लेकर आते है। अच्छे किस्म के बैल जोड़ी लगभग 20 से 30 हजार मे बिकती है। वहीं भैंसों की जोड़ी 25 से 35 हजार रू तक में मिल जाती है। गाय बाछी की जोड़ियां लगभग 10 से 15 हजार रू. तक बिक जाती है। 


कभी कभी सौदा नहीं जमता है तो फिर अगले बाजार को या अन्य जगह के बाजार में मवेशियों को ले जाया जाता है। वर्षा शुरू होने से पहले दो चार माह में ही बैल बाजारों में रौनक रहती है, साल के बाकी दिनों में बैल बाजार सिर्फ नाम मात्र रह जाते है। गीदम के अलावा जगदलपुर के डिमरापाल, लोहंडीगुडा जैसे जगहों में बड़े बड़े बैल बाजार लगते है। मुझे बचपन के वे दिन अच्छे से याद है आज गीदम में जहां बस स्टेंड है वहां कभी बैल बाजार भरता था। इस जगह को बैल बाजार ही कहते थे। बैलों की जोड़ियां चारों तरफ खुंटियों में बंधी रहती थी। अब बैल बाजार नगर से बाहर हो गया है। कृषि मे अब में टै्रक्टर के प्रयोग से नागर जोतने के लिये बैलों की आवश्यकता कम रह गई है। जिसके कारण बस्तर के ये बैल बाजार धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे है। 
...ओम सोनी, दंतेवाड़ा। 

31 दिसंबर 2018

लाई लड्डू वाला गीदम जात्रा

लाई लड्डू वाला जात्रा.....!

प्रतिवर्ष अगहन माह में धान कटाई के बाद बस्तर में जात्रा का आयोजन प्रारंभ हो जाता है। निर्विघ्न धान कटाई के बाद देवी को कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिये देव गुड़ी में ग्रामीण जात्रा का आयोजन करते है। ग्राम देवी से कृषि बाड़ी की समृद्धि और घातक बीमारियों से सुरक्षा के लिये देवी से प्रार्थना की जाती है। ग्राम देवी को अपनी शक्ति के अनुसार नारियल फल प्रसाद आदि का चढ़ावा चढ़ाते है।

सदियों पुरानी परंपरानुसार ग्रामीण देवी के सम्मुख चढ़ावा के रूप में बकरा, मुर्गा, बतख आदि की बलि भी देते है। छोटे स्तर पर मेले का आयोजन भी होता है। अगहन माह में  बस्तर की मुख्य देवगुड़ियों में इस प्रकार के जात्रा का आयोजन होता है। जात्रा में आसपास के ग्रामों के देवी देवताओं के छत्र डंगईयां एवं ध्वजा भी शामिल होने के लिये आते हैं। विभिन्न देव गुड़ियों के मुख्य पुजारी बैगा सिरहा भी  देवी की सामुहिक वंदना करते है। 

माहरा समुदाय के वादकों द्वारा देवी के सम्मान में मोहरी बाजा बजाते है। मोहरी बाजा की कर्ण प्रिय आवाज से पुरे जात्रा का माहौल भक्तिमय हो जाता है।  देवी से सुख समृद्धि की कामना करने हेतु भक्तों की भीड़ लगी रहती है। विभिन्न मिठाईयों , सामानों एवं खिलौने की दुकाने सजती है। आवश्यकतानुसार ग्रामीण जरूरतों का सामान लेते है।  आदिवासी बालायें नृत्य संगीत के माध्यम से अपनी खुशियां जाहिर करती है और जात्रा का आनंद लेती है। 

दंतेवाड़ा में जात्रा के आयोजन के बाद गीदम के मातागुड़ी में शीतला माता के सम्मान में प्रतिवर्ष जात्रा का आयोजन होता है। यहां के जात्रा में मेले के ही तरह काफी भीड़ होती है। कई दुकाने सजती है। परंपरा के चलते ग्रामीण जात्रा से कुछ ना कुछ सामान अवश्य खरीद कर ले जाते है।


गीदम के जात्रे में मै हर वर्ष जाता हूं। बचपन में तो जात्रा में जाने का काफी शौक था। स्कुल से जल्दी आने की कोशिश करते, फिर दौड़कर जात्रा में घुमने जाते थे। दरअसल जात्रा जाने का मेरा उद्देश्य देवी दर्शन के साथ लाई लडडू भी खाना होता था। गीदम के इस जात्रे में लाई लड्डू का चलन सालों पुराना है। यहां के दुकानों में हाथो हाथ लाई और गुड़ के घोल से लड्डू बनाकर बेचा जाता है।


दस रू. के दर से तीन या चार लड्डू मिल जाते थे। जात्रा में अधिकांश ग्रामीण और बच्चों का पसंदीदा खाजा यही लाई लडडू होता है। मैं तो बस इसी लडडू के लिये जाता हूं। इस बार तो पचास रू. में 15-20 लड्डू मिल गये और हमने तो लाई लड्डू खाकर  अगहन जात्रा का आनंद लिया। आप ने कभी लाई लड्डू खाया है कि नहीं ? अपना कोई अनुभव जरूर शेयर करें।

आलेख ओम सोनी


29 दिसंबर 2018

लावा बटेर का शिकार

लावा बटेर का शिकार......!


धान कटाई कार्य लगभग पूर्ण हो गया है। खेतों में धान के कुछ दाने बिखरे हुये बच जाते है उन दानों को चुगने के लिये  प्रवासी पक्षी जैसे लावा बटेर बड़ी संख्या में आ रहे है। इन पक्षियों को शिकार बस्तर में आम बात है। बटेर भूमि पर रहने वाले जंगली पक्षी हैं। ये ज्यादा लम्बी दूरी तक नहीं उड़ सकते हैं और भूमि पर घोंसले बनाते हैं। इनके स्वादिष्ट माँस के कारण इनका शिकार किया जाता है।



खेतों में धान चुगने पहुंचने वाले इन पक्षियों का शिकार भी लगातार हो रहा है। गुलेल तीर धनुष से शिकार तो हो ही रहा है साथ ही ग्रामीण डंडे में गोंद लगाकर छोड़ देते हैं इस पर बैठते ही बटेर के पैर चिपक जाते हैं। इन्हें ग्रामीण पकड़ लेते हैं। कुछ को मारकर खा लेते हैं और कुछ को बेच भी देते हैं। एक पक्षी की कीमत सौ रुपए तक होती है। 

इन पक्षियों का शिकार करने के सबसे प्रचलित तरीका जाल में पक्षियों को फंसाना होता है। यह जाल मछली पकड़ने वाले जाल से दस गुना से अधिक बड़ा होता है। बांस के बड़े से ढांचे के सहारे जाल बांधा जाता है। जाल के बीच में शिकारी के लिये जाल पकड़ने लायक जगह होती है।

 वह जाल उठाकर खेतों में धुमता है और जाल को जमीन पर पटक देता है जिससे लावा पक्षी जाल में दब कर फंस जाती है। इसके अतिरिक्त शिकरा बाज पक्षी के मदद से भी इन पक्षियों का शिकार किया जाता है। पक्षीविदों के मुताबिक लावा.बटेर स्थानीय नहीं बल्कि प्रवासी पक्षी हैं जो यूरोपीय देशों से यहां आती हैं। 

लावा.बटेर पक्षियों को कॉमन क्वेल कहा जाता है। ये यूरोपीय देशों अल्बानिया साइप्रस हंगरी पुर्तगाल यूक्रेन और स्पेन का मूल पक्षी है। आमतौर पर ठंड के दिनों में धान की कटाई के बाद कुछ दाने खेतों में बच जाते हैं जो इनका भोजन होते हैं। 

यही धान के दाने चुगने वे यहां पहुंचते हैं और शिकारियों द्वारा बिछाए जाने वाले जाल में वे फंस जाते हैं।आईयूसीएन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक लावा.बटेर या कॉमन क्वेल अब विलुप्त हो रहे पक्षियों में शामिल है। 

विदेशों में बटेर उत्पादन एक विकसित व्यवसाय का रूप ले चुका है। भारत में इसका विकास धीरे.धीरे हो रहा है।  चूजे 6 से 7 सप्ताह में ही अंडे देने लगते हैं। मादा प्रतिवर्ष 250 से 300 अंडे देती है। 80 प्रतिशत से अधिक अंडा उत्पादन 10 सप्ताह में ही शुरू हो जाता है। 

इसके चूजे बाजार में बेचने के लिए चार से पांच सप्ताह में ही तैयार हो जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बटेर को किसी भी प्रकार के रोग निरोधक टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है।

फिलहाल तो बस्तर में इनके संरक्षण के लिये भी उदासीनता ही दिख रही है। 

आलेख ओम सोनी दंतेवाड़ा