23 दिसंबर 2019

झुलन दरहा मे झुलता पानी

झुलन दरहा मे झुलता पानी...!

काँगेर घाटी वन सम्पदा एवं दुर्लभ जीव जन्तुओ से तो बेहद सम्पन्न है. इसके साथ ही काँगेर घाटी अपने अंदर झरनो की अनदेखी खूबसूरती को भी छिपाये हुए हैं. काँगेर घाटी के घने जंगलो मे आज भी कई ऐसे छोटे मोटे झरने है जिसकी जानकारी आज भी बेहद कम लोगों को है.

काँगेर घाटी मे ऐसा ही एक झरना है झुलन दरहा. हाल ही में यह झरना आम पर्यटको के सामने आया है.झुल झुल कर दरहे मे गिरता यह झरना बेहद ही खूबसूरत स्थल है. तीरथगढ की तरह सीढीदार पत्थरो से गिरती कल कल ध्वनि प्रकृति की स्वर लहरियो के साथ अद्भुत ताल मेल बनाती है.
झुला झुले पानी ऐसा अहसास इस झरने की अनोखी खासियत है.माँडू का हिन्डोला महल और काँगेर घाटी का झुलन दरहा दोनों ही तन मन मे झुला झुलने का अनुभव कराते है.
यह झुलन दरहा बेहतरीन पर्यटन स्थल है एवं परिवार सहित वन भ्रमण कार्यक्रम के लिये आदर्श स्थल है.
ओम...!
शानदार छायाचित्र के लिए मुन्ना बघेल जी का बहुत आभार...!

6 दिसंबर 2019

कांगेर घाटी का चिकनर्रा जलप्रपात


कांगेर घाटी का चिकनर्रा जलप्रपात.....!

बस्तर के अनजानी खूबसूरती का सबसे नायाब खोज चिकनर्रा झरना है. हाल ही में बाहरी दुनिया के सामने लाया गया चिकनर्रा झरना कांगेर घाटी का नया पर्यटन स्थल है. लगभग 40 फ़ीट उंचाई लिये यह झरना बेहद ही मनमोहक है. कांगेर घाटी मे दुर दुर तक फ़ैले जंगलो मे चिकनर्रा की कल कल ध्वनि संगीत के नये नये राग छेड़ती है.



तीरथगढ की तरह सीढीदार रास्तो से होकर जलधारा कहीं दुर घने जंगल मे खो जाती है. कुण्ड की गहराई मे मचलती मछलिया और आसमान मे उडते परिन्दो का का आनंद मय दृश्य आँखो के सामने नृत्य करते रहता है. बेहद ही खूबसूरत इस झरने की बात ही निराली है.

इस शानदार तस्वीर के लिये मुन्ना बघेल जी का बहुत बहुत आभार

29 नवंबर 2019

रमणीय "आमा दरहा जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 05
रमणीय "आमा दरहा जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला


इस तरह ०१ सितम्बर २०१९ के दिन को मेरी यादगार सफर का अंत हुवा ! आखिर में जब हम लोग (श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर, श्री बलवंत पैकरा सर और मैं) वापस केशकाल के लिए लौटने लगे, तब हमे श्री सोरी एवं पैकरा सर ने बताया की ग्राम बटरली के घाट वाले रोड के कुछ पहले आमा नाला में दो और झरने बनते हैं, जो की पूर्णतः बरसाती झरने हैं तथा ग्रीष्म ऋतू के आगमन होते होते सुख जाते हैं, वरन वर्षा ऋतू एवं शरद ऋतू में इनका सौंदर्य अकल्पनीय, अकथनीय, अवर्णनीय होता है! वैसे यह नाला(पूर्णतः कुवेमारी-बावनिमारी ग्राम पंचायत से लगा क्षेत्र) घाट के तेज खड़ी ढाल का अनुसरण करता है ! यही कारण है की आमा नाला पर हमे २-३ से अधिक रमणीय जलप्रपातों के अवलोकन होते हैं!

आमा नाला इस स्थान पर लगभग लगभग १५ फिट से गिरकर एक सुन्दर झरने का निर्माण करता है, जिसे आज तक कोई नाम नहीं दिया गया है, पर आमा नाला की खाई पर बनने के कारण इसे आमा दरहा भी कहा जाता है! कुछ ग्रामीण लिमदरहा झरने के नज़दीक होने के कारण इसे लिमदरहा द्वितीय - लिमदरहा तृतीय झरना भी बुलाते हैं! प्रथम झरने की गहरायी लगभग ३५-४० फिट की है, किन्तु इसके निचे उतरने का रास्ता अत्यंत दुष्कर है! सभी तरह से उर्ध्वाधार किनारों के कारण हम लोग निचे नहीं उतर पाए !


द्वितीय झरना लगभग १५ फिट ऊँचा है तथा इस जगह निचे उतरकर काफी दूर तक झरने से बहते आमा नाले के जल को ट्रेक किया जा सकता है! जलप्रवाह का मार्ग पूर्ण रूप से पाषाण बाधित रह्ता है, अतः यह स्थान आपके trekking skills की अच्छी परीक्षा लेगा !
Last but not the least, अंत में मैं श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर एवं श्री बलवंत पैकरा सर का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी अनुभव यात्रा सफल हो सकी !
केशकाल से लौटकर जितेन्द्र नक़्क़ा

"उपरबेदी जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 04
 "उपरबेदी जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला


कभी सुना है ऐसा जलप्रपात जहां पहुंचना इतना दुश्वार हो जाए, की आपको उसके दीदार के लिए निचे उतरने का स्थान ही ना मिले, उपरबेदी ऐसी ही एक जगह है, जहां एक झरना खोजने जाओ, तो दो-तीन झरने और मिलने चालू हो जाते हैं, बस रास्ते ही नहीं मिलते !

केशकाल से बटराली होते हुवे जब हम लोग (श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर, श्री बलवंत पैकरा सर और मैं) कुवे-मारी पार करते हुवे उपरबेदी ग्राम पहुंचे, तब हमे निकट के ग्रामीणों ने बताया की यहां एक छिपा हुवा झरना है, जिसे "उपरबेदी जलप्रपात" कहा जाता है! यहाँ स्थानीय नाला लगभग ४०-५० फिट निचे गिरकर एक अत्यंत मनोरम निर्झर का निर्माण करता है ! इस नाले का जल जिस खाई में गिरता है, उसके ठीक सामने एक बड़ी और गहरी वादी चारो ओर से नज़र आती है ! वादी भी इतनी गहरी और खड़ी उतरन वाली की अच्छे अच्छों के होश फाख्ता हो जाएँ ! हम लोग निचे जाने का रास्ता ढूंढते रह गए, और गलती से एक और अनदेखे झरने के दीदार हो गए ! इसे कहते हैं एक के दाम में दो (फायदे) !
उपरबेदी झरने के दो सोपान हैं, जिसमे से प्रथम सोपान अधिकतम ८-१० फिट ऊँचा है, जिसके बाद का सोपान मुख्य सोपान है, और लगभग ४०-५० फिट ऊँचा है! यह प्राकृतिक स्थल इतना ख़ूबसूरत है की इसके सामने मानव-निर्मित सबसे सुन्दरतम रचना भी फीकी लगने लगे !
केशकाल से लौटकर जितेन्द्र नक़्क़ा

स्वर्ग सा सुन्दर मुत्ते खडका जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 03
स्वर्ग सा सुन्दर मुत्ते खडका जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव


मुत्ते खडका के बारे में मैंने आज से पहले बस्तर के प्रसिद्द लेखक एवं शिक्षाविद डॉक्टर सुरेश तिवारी जी की पुस्तक “बस्तर-पर्यटन, संस्कृति और इतिहास” में पढ़ा था ! उनकी कुशल लेखन शैली और प्रभावी वर्णन से मै इतना प्रभावित हुवा की मैंने तब से यह तय किया था की कभी ना कभी इस आश्चर्य के दीदार जरूर करूँगा! "मुत्ते खड़का" शब्द गोंडी भाषा से लिया गया माना जाता है, जिसमे मुत्ते का अर्थ औरत से है और खड़का का अर्थ खाई में गिरते पानी से है, अर्थात ऐसी अनोखी खाईनुमा जगह जहां कोई औरत दूध के समान सफेद निर्मल जल गिरा रही हो।


यह क्षेत्र कुवे-मारी ग्राम पंचायत क्षेत्र के निकट स्थित मडगाव नामक ग्राम के बाहरी क्षेत्र से प्रवाहित होते नाले पर बनता है ! यहां का स्थानीय नाला लगभग 35 फिट से गिरकर एक बहुत ही रमणीय जलप्रपात का निर्माण करता है ! इसकी विशेषता प्रपात के ठीक नीचे स्थित पाषाण हैं, जिनके आकार कुछ बड़े-कुछ छोटे इस तरह से प्रपात को घेरे हुवे हैं, की प्रपात का जल इन पर इतनी जोर से गिरता है कि पूरे क्षेत्र में जल कणों की फुहारें उठाने लगती हैं और आसपास खड़ा हर व्यक्ति इसे तर-बतर हो जाता है। मुख्य सोपान में प्रपात लगभग 35 फिट गिरकर प्रथम सोपान बनाता है, उसके नीचे का द्वितीय सोपान प्रथम सोपान से लगभग 300 फिट दूर तकरीबन 6-7 फिट गिरकर द्वितीय सोपान बनाता है।


प्रपात के ऊपर का भाग जहां से स्थानीय नाले का जल प्रपात बनकर नीचे उतरता है, वह स्थान भी काफी रमणीय है एवं इस स्थान से सारा निकटस्थ वनाच्छादित क्षेत्र दिखाई पड़ता है, जो कि बहुत ही दर्शनीय लगता है। यहां बैठकर कोई भी व्यक्ति आराम से पिकनिक बना सकता है।
इस स्थान पर पहुचने का पहुच मार्ग भी काफी दुर्गम है एवं स्थानीय सहायता के बगैर इस स्थान का पता लगाना थोड़ा दुष्कर हो सकता है। यह प्रपात बस्तर के सुप्रसिद्ध जलप्रपातों की सूची में अपना नाम दर्ज कराने का माद्दा रखता है। क्योंकि इस स्थान पर पहुचने के बाद भी नीचे उतरने इतना आसान नही है, इसके लिए आपको अच्छे tracking skills की जरूरत पड़ेगी, तो इस नाते यह स्थान ट्रेकिंग के लिए सर्व उपयुक्त है।
अंत में पूर्व की भांति मैं श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर्, श्री पैकरा सर का धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी।

"मिरदे जलप्रपात" (केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव)

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER 02
 "मिरदे जलप्रपात" (केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव)


पिछला रविवार मेरे लिए यादगार रहा! जहां कोंडागांव जिला जाना हुवा, वहीँ अनेकों आश्चर्यों से भी सामना हुवा! श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी के साथ जैसे ही लीमदरहा जलप्रपात देख कर हम आगे बढे! यह निश्चित हुवा की अगले आश्चर्य के रूप में हम लोग मिरदे जलप्रपात से मुखातिब होंगे !


मेरे लिए तो सभी नाम नए और जगह अनजान थी, पर अनजाने आश्चर्यों का सामना करने की अनुभूति ही अलग होती है ! मेरे लिए यह काफी शिक्षाप्रद और चुनौतीपूर्ण था!



बावनीमारी ग्राम से आगे बढ़ते हुवे हम लोग कुवे-मारी ग्राम पहुंचे, जिसके निकट ही लगभग ०२ किलोमीटर जाने पर वहां का स्थानीय नाला(ग्रामीण इस नाले को मिरदे नाला के नाम बुलाते हैं!) लगभग ७० फिट निचे सीढ़ीनुमा अंदाज में गिरकर एक नयनाभिराम प्रपात का निर्माण करता है, जिसे ग्रामीण मिरदे जलप्रपात के नाम से बुलाते हैं! यह जलप्रपात इतना ख़ूबसूरत और ऊँचा है की जहां प्रपात के ऊपर से सारा निकटवर्ती क्षेत्र दिखलाई पड़ता है! वहीँ निचे उतरने पर सीढ़ीनुमा अंदाज में गिरती जलधारा निचे के सोपानों में और चौड़ी नज़र आने लगती है ! 

ऊपर से निचे की ओर गिरती जलधारा को देख कर ऐसा लगता है मानो किसी ने जल की धारा नहीं बल्कि दूध की धारा बहा दी हो! आखिरी सोपान की ऊँचाई ३०-३५ फिट और ढलान ६० डिग्री की है, जिसे साहसी पर्यटक चढ़ने की कोशिश कर सकते है! इसके ऊपर के सोपान सीधे उर्ध्वाधार है, जिनके लिए कोई अनुभवी पर्वतारोही ही उपयुक्त होगा! यह स्थान ट्रैकिंग के लिए अतिउपयुक्त है, जहां प्रपात के निचले भाग में पहुंचने का मार्ग अत्यंत दुर्गम है, पास की ढलान वाली चट्टानों को पगडंडी बनाकर निचे उतरना पड़ता है, जो काफी रोमांचक, चुनौतीपूर्ण और साहसिक होता है !
यह एक बारहमासी जलप्रपात है और निकटस्थ ग्रामीणों में प्रसिद्ध है, परन्तु कुवेमारी ग्रामपंचायत से बाहर विरले ही इसके बारे में जानकारी रखते हैं! बारहमासी झरना होने के कारण यहां सदैव जल रहता है, परन्तु ग्रीष्मकाल में इसका सौंदर्य क्षीण हो जाता है !
आभार: अंत मे मै श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी !
कोंडागांव जिले से लौटकर जितेंद्र नक़्क़ा

लीम दरहा जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER 01
लीम दरहा जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव


शोध का एक नियम होता है ! पहले विषय चयन, फिर साहित्य अवलोकन, फिर कार्यप्रणाली, फिर कार्य! आज मेरे लिए भी वैसा ही मौका था! हमेशा मेरे दिल में ख्याल आता था, जिस जगह का एक घाट(केशकाल घाट) ही इतना सुन्दर है, की छ.ग. के सबसे सुन्दर घाट में से गिना जाता है, क्या ऐसे सुन्दरतम स्थल में और आश्चर्य नहीं होंगे? क्या वहां और दर्शनीय स्थल          नहीं होंगे ?
मेरे एक सहयोगी श्री कैलाश बघेल ने मुझे इस रविवार कोंडागांव आमंत्रित किया ! मेरे लिए यह प्रस्ताव काफी उत्साहजनक था, क्यूंकि आज मुझे मेरे सवालों के जवाब मिलने वाले थे ! तय तो यह था जगदलपुर से केशकाल आते हुवे हम लोग दाए मुड़ेंगे, पर केशकाल से हमारे साथ पथप्रदर्शक के तौर पर जुड़े दो शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी ने हमारी दिशा ही बदल दी !

यहां से हमारा रोमांचक सफर चालू हुआ ! सर्वपप्रथम हम लोगों ने ग्राम बटराली होते हुवे केशकाल क्षेत्र के मारी क्षेत्र में प्रवेश किया! “मारी” शब्द का अर्थ है पठार या पाट क्षेत्र, जिसके चारों तरफ सकरे एवं पूर्ण ऊर्ध्वाधार किनारों के कारण इस क्षेत्र के नाले पहाड़ों/चट्टानों से उतरकर अप्रितम, अद्भुत, अविस्मरणीय जलप्रपात बनाते हैं!
लीम दरहा जलप्रपात का ‘नाम इस सूची में सबसे पहले आता है! आमा नाला नामक नाले का जल बावनीमारी ग्राम के निकट लगभग २५ फिट से गिरकर इस नयनाभिराम प्रपात का निर्माण करता है! यह जलप्रपात इतना ख़ूबसूरत है की जहां प्रपात के ऊपर से सारा निकटवर्ती क्षेत्र दिखलाई पड़ता है! वहीँ निचे उतरने पर ३०-३५ फ़ीट चौड़े एवं २०-२५ फ़ीट ऊँचे प्रपात के अवलोकन होते हैं! प्रपात का जल ठीक निचे गिरकर एक गोलाकार कुंड का निर्माण करता है!
आप लोगों को यह स्पष्ट कर दूँ की यह बारहमासी प्रपात इतना अल्पज्ञात है की बावनीमारी पंचायत के बाहर किसी को इस अद्भुत स्थान के बारे में जानकारी नहीं है ! बारहमासी झरना होने के कारण यहां सदैव जल रहता है, परन्तु ग्रीष्मकाल में इसका सौंदर्य क्षीण हो जाता है !
आभार: अंत मे मै श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी !
कोंडागांव जिले से लौटकर जितेंद्र नक़्क़ा

3 अगस्त 2019

अविश्वसनीय चित्रकोट

अविश्वसनीय चित्रकोट .......!
चित्रकोट जलप्रपात आज पुरी दुनिया में बस्तर की पहचान बन चुका है। इस झरने की विशालता ने दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। इसकी जलधाराओं की गर्जना ने पर्यटको को रोमांचित किया है।
इसकी असीम खुबसूरती ने पर्यटकों को भाव विभोर कर दिया। अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो बस यही है इस बात को चित्रकोट जलप्रपात अपनी खुबसूरती और विशालता से प्रमााणित करता है।
इंद्रावती नदी की करोड़ों बुंदो की जलधारायें नब्बे फीट की उंचाई से जिस गर्जना के साथ गिरती है उसकी आवाज पर्यटकों के धड़कनों को तेज कर देती है। उस गर्जना को सुनकर देखकर कोई भी सैलानी बिल्कुल अवाक रह जाता है। उसके मुख से सिर्फ एक ही शब्द निकलता है वाह चित्रकोट वाह।


चित्रकोट का झरना आज पुरी दुनिया में मशहूर है। इसके पीछे का कारण इसकी खुबसूरती और इसकी विशालता है। यह झरना जगदलपुर से 30 किलोमीटर की दुरी पर चित्रकोट ग्राम में स्थित है। बस्तर की प्राणदायिनी इंद्रावती पर बना यह झरना लगभग 90 फीट की उंचाई से गिरता है। यह झरना ना केवल भारत वरन एशिया का सबसे चौड़ा झरना है।
इसकी चौड़ाई आधे किलोमीटर से भी ज्यादा लगभग 750 मीटर तक मापी गई है। पुरे विश्व में नियाग्रा जलप्रपात की चौड़ाई सबसे अधिक है। उसके बाद दुसरे नंबर का खिताब चित्रकोट को हासिल है और पुरे एशिया महाद्वीप में चित्रकोट झरने की चौड़ाई का कोई भी झरना नहीं है इस कारण चित्रकोट झरने को एशिया का नियाग्रा जलप्रपात भी कहा जाता है। इसका आकार घोड़े की नाल के समान है।
वर्ष भर में चित्रकोट के अनेकों रूप देखने को मिलते है। मानसून के दिनों में नदी में अत्यधिक जलराशि के कारण यह झरना अपनी विशालता के चरम पर होता है। शीतकाल में इसकी कई जलधारायें रजत मोतियों की धाराओं के रूप में गिरती है।
चांदनी रात में तो चित्रकोट की खूबसुरती का कहना ही क्या, सैलानी तो सारी रात जलधाराओं के सौंदर्य को देखते हुए ही गुजार देता है। पहली बार जिस किसी ने भी चित्रकोट झरने को देखा है उसके दिलो दिमाग में कई दिनों तक सिर्फ चित्रकोट की छवि ही घुमते रहती है।
वहीं ग्रीष्मकाल में दो धारायें ही चित्रकोट का नाम कायम रख पाती है। इस साल अत्यधिक गर्मी, और इंद्रावती में बने हुए बांधों के कारण चित्रकोट का झरना सुख गया था। जहां तक लोगों को ज्ञात है कि ऐसी भयावह स्थिति पहली बार देखने को मिली थी।
जनवरी के बाद से नीचे बने गहरी झील में स्थानीय नाविकों द्वारा नावे और डोंगियां चलाई जाती है। इन नावों की सवारी करते हुए पर्यटक जब जलधाराओं के पास पहुंचता है तब जलधाराओं की फुंहारे तन और मन दोनों को ही शीतल कर देती है।
सूर्य की रोशनी भी चित्रकोट की धाराओं के साथ ऐसा तालमेल बैठाती है कि पानी की हर बुंदों में इंद्रधनुष के सातो रंग निखर उठते है। चित्रकोट के पास ही भगवान शिव को समर्पित मंदिर है।

चित्रकोट का झरना प्राकृतिक सौंदर्य के साथ भक्ति रस अपने में समाहित करते हुए सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। क्या बुढ़ा, क्या बच्चा, क्या पुरूष और क्या महिला, सभी इसकी सुंदरता के कायल है। बस्तर के सभी निवासियों के दिलों में चित्रकोट का झरना राज करता है।
इस चित्रकोट के झरने की विशालता विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर खिंचती है। हर साल देश विदेश के कोने कोने से हजारो सैलानी चित्रकोट के सौंदर्य को निहारने आते है। तो अब आप कब आ रहे है चित्रकोट ..............!

21 जून 2019

तिरिया के झरने

तिरिया के झरने
तिरिया के झरने ........देखने के लिये यूटयुब के इस लिंक  तिरिया के झरने पर क्लिक करे और बस्तर भूषण का यूटयुब चैनल जरूर सब्सक्राईब करे।

तिरिया के झरने

4 फ़रवरी 2019

बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना

बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना - झारालावा......!

असीम सौंदर्य को अपने अंदर समेटे हुये बस्तर में आज भी ऐसी कई जगहे है जहां इंसान की पहुंच ना के बराबर है। बीहड़ जंगलों में ऐसा अनजानी जगहों का सौंदर्य किसी का भी मन मोह लेता है। थकान और डर दोनों ही प्रकृति के अदभूत सौंदर्य में कहीं खो जाता है। 

दंतेवाड़ा जिले के मस्तक पर तिलक की तरह स्थापित बैलाडीला की पर्वत श्रृंखला हजारों सालों से इतिहास और प्राकृतिक संुदरता को संजोये हुये है। बैलाडीला के ढोलकल में स्थापित गणेश प्रतिमा नागयुगीन वैभवशाली इतिहास की साक्षी है वहीं बैलाडीला के पहाड़ों से फूटते झरने इसके प्राकृतिक सौंदर्य को चार चांद लगाते है। 

बस्तर झरनों का पर्याय है। देश विदेश के हजारों सैलानी इन्हे देखने आते है। ऐसा ही एक झरना जो सचमूच में बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना है फिर भी यह लोगों की नजरों से आज भी ओझल है। बैलाडीला के पहाड़ों में से निकलती एक नदी झारालावा बेहद ही खुबसूरत झरना बनाती है जिसको देखने के बाद आप भी यहीं कहेंगे कि सच में यह बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना है। 


दंतेवाड़ा से बचेली जाने के मार्ग में भांसी नामक छोटा सा ग्राम है। इस ग्राम से कुछ दूर पहले एक कच्चा रास्ता अंदर बासनपुर की तरफ जाता है। बासनपुर ग्राम से कुछ दुरी पर बैलाडीला की उंची पहाड़ी है। यहां पहाड़ी दो हिस्सों में बंटी हुई है। इस पहाड़ी पर चढकर जाना पड़ता है। चारों तरफ घने जंगलों से युक्त पहाड़ो के बीच में झारालावा नाम का यह बेहद खुबसूरत झरना है।

यहां एक विरान ग्राम है जिसका नाम झारालावा है। इसी ग्राम के नाम से यह झरना झारालावा और यह नदी भी झारालावा नदी के नाम से ही जानी जाती है। यह झरना दो चरणों में है। पहला चरण तो पहाड़ी के तलहटी में ही है। यहां आसानी से बिना थकावट के पहुंचा जा सकता है। यहां नदी एक गहरे कुंड में सुंरग के रास्तों से झरना बनाते हुये गिरती है। आंखों को सुकून देनी वाली सुंदरता यहां काफी खतरनाक और डरावनी हो जाता है। यहां काफी संभलकर चलना होता है। सावधानी हटी दुर्घटना घटी वाली कहावत यहां पर चरितार्थ होने की संभावना सबसे ज्यादा दिखती है। 

इस झरने के बाद मुख्य झरने के लिये पहाड़ी की उंचाई पर जाना आवश्यक हो जाता है। 3000 फीट की उंचाई पर चढ़ने के बाद पुन नीचे की तरफ उतरना पड़ता है। यहां  पहाड़ो के बीच में एक गोलाकार कुंड बना हुआ है जिसमें बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना अपने रंगों की छटा बिखेरता हुआ कल कल बहता है। झरने की आवाज को पहाड़ी के नीचे से सुनाई देती है। यहां झरना तीन चरणों में गिरता है। पहले चरण में लगभग 70 फीट उंचाई लिये हुये एक प्लेटफार्म पर यह झरना गिरता है।  


 दुसरे चरण में 20 फीट उंचे प्लेटफार्म से गिरकर यह एक कुंड का निर्माण करता है। कुंड का सफेद झरना काले रंग में परिवर्तित गहरे कुंड मंे ठहर जाता है। यहां आने के बाद झरने की फूहारे जब चेहरे पर पड़ती है तो सारी थकावट कुछ पलों मे ही दुर हो जाती है। मन को आहलादित करने वाली झरने की फूहारे फिर से तन मन को ताजा कर देती है। 

यहां पर प्रकृति ने अपनी इंद्रधनुषी खुबसूरती को बिखेर कर रखा है। इन खुबसूरत रंगों से सराबोर यह झरना पुरे बस्तर का सबसे खुबसूरत झरना है। इसकी खूबसुरती को बस घंटो निहारते रहो। यहां से जाने की इच्छा भी नहीं होती है। वाकई में यह झरना बस्तर के झरनों का कोहिनूर है। इसकी खुबसूरती का मुकाबला बस्तर का कोई भी झरना नहीं कर सकता है। 

यहां जाने के लिये किसी ग्रामीण को अपने साथ ले जाना ही सबसे बड़ी समझदारी है। वैसे यह क्षेत्र नक्सल गतिविधियों से बेहद प्रभावित है। इसलिये यहां जाने से पूर्व अपने विवेक का इस्तेमाल जरूर करें। 
ओम सोनी दंतेवाड़ा

5 जनवरी 2019

स्टेच्यू आफ यूनिटी की उंचाई का बस्तर में एक झरना

स्टेच्यू आफ यूनिटी की उंचाई का बस्तर में एक झरना.......!

बस्तर की धरती में अनगिनत ऐसे स्थल है जिसे देखे बिना आपका भारत भ्रमण पुरा नहीं हो सकता है। यहां के इन प्राकृतिक उपहारो ने राज्य और देश में नहीं, वरन पुरे विश्व में अपने अनूठेपन की छाप छोड़ी है। उदाहरण के तौर पर चित्रकोट जलप्रपात जिससे आप सभी परिचित होंगे, इस झरने की चौड़ाई ने पुरे भारत में सर्वाधिक चौड़ाई वाले झरने का खिताब दिया है। 


चित्रकोट झरने को देखने के लिये हर वर्ष हजारों देशी विदेशी पर्यटक बस्तर आते है। चित्रकोट झरने की तरह कांगेर घाटी की कुटूमसर गुफा अपने अदभूत झूमर आकृतियों के लिये विश्वप्रसिद्ध है। हर वर्ष हजारों विद्यार्थी इस गुफा की गहराई में उतरकर प्राकृतिक कलाकृतियों को निहारते है। अंधी मछलियों को गुफा में देखने आते है।

अभी कुछ दिनों पहले गुजरात में नर्मदा सरोवर स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया गया है। देश की एकता के प्रतीक स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भारत के प्रथम उप प्रधानमन्त्री तथा प्रथम गृहमन्त्री वल्लभभाई पटेल को समर्पित एक स्मारक है।यह विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति है जिसकी लम्बाई 182 मीटर 597 फीट है। स्टेच्यू आफ यूनिटी से आज पुरा विश्व परिचित है। अपनी उंचाई के कारण स्टेच्यू आफ यूनिटी कई किलोमीटर दूर से दिखाई देती है। 


स्टेच्यू आफ यूनिटी के उंचाई के लगभग बस्तर में एक झरना है जिसके बारे में तो यहां के स्थानीय निवासियों को भी पता नहीं है। बस्तर के सूदुर दक्षिण में, बीजापुर जिले के उसूर ब्लाक में ,तेलंगाना की सीमा से लगा छोटा सा ग्राम है नंबी। इस ग्राम से 03 किलोमीटर की दुरी पर पुरे बस्तर का सबसे उंचा झरना स्थित है।नंबी ग्राम के पास होने के कारण यह झरना भी नंबी झरना या नंबी धारा के नाम से ही चर्चित है।



कुछ वर्ष पहले जिले के पुलिस अधिकारी इस झरने को देखने के लिये गये थे तब इस झरने की उंचाई नापी गई थी जो कि 180 मीटर थी। यह झरना भी उंचाई के आधार पर  स्टेच्यू आफ यूनिटी के आसपास ठहरता है। 

कुछ दिनों पहले मुझे भी इस झरने को देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह झरना वास्तव में बहुत ही उंचा है। नंबी ग्राम से तीन किलोमीटर दूर होने के बावजूद भी यह झरना सामने ही दिख रहा था। वैसे यह झरना मौसमी है। जुलाई से लेकर मात्र अक्टूबर तक ही इस झरने में पानी रहता है। अत्यधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र का समूचित विकास नहीं हो पाया है।


यहां जाना भी खतरे से खाली नहीं है। घने जंगलों के मध्य से सूनसान पगडंडी एक मात्र मार्ग है जिस पर हर 05 मीटर में अवरोध के लिये गडढे खोदे गये है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि कुछ सालों में नंबी तक जाने के लिये सड़क होगी, भयमुक्त होकर पर्यटक नंबी धारा की उंचाई को देखने जायेंगे और चित्रकोट जलप्रपात के चौड़ाई की तरह नंबी झरने की असीम उंचाई भी बस्तर की पर्याय बनेगी। 

वर्तमान हालात के मुताबिक अभी यहां जाने के बारे में सोचियेगा भी नहीं। 

नंबी झरने की ये फोटो अयाज तंबोली सर के सौजन्य से प्राप्त। 

आलेख ओम सोनी दंतेवाड़ा

28 दिसंबर 2018

बस्तर की प्राणदायिनी - इंद्रावती

बस्तर की प्राणदायिनी - इंद्रावती.....!

इंद्रावती, बहुत ही प्यारा नाम है बस्तर की इस सरस सलिला का। बस्तर के लाखों लोगों को जीवन देने वाली इस इंद्रावती से हर बस्तरिया उतना ही प्रेम करता है जितना अपनी मां से। बस्तर में ना जाने कितनों को बनते बिगड़ते देखा है इस इंद्रावती ने। इंद्रावती ने बस्तर की इस धरती को सींच सींच कर हरा भरा बनाया है। 

वर्षा काल में जब इंद्रावती अपने रौद्र रूप को धारण कर लेती है तो पुरा बस्तर उसके सामने नतमस्तक हो जाता है। गर्मी के दिनों में यह पुरे बस्तर की प्यास बुझाती है वहीं शीतकाल में अपने नीले जल की सुंदर छटा बिखेरते हुये हर किसी का मनमोह लेती है। बस्तर की प्राणदायिनी इंद्रावती के बिना बस्तर की कल्पना नहीं की जा सकती है। 


इंद्रावती नागयुगीन बस्तर की इंद्रनदी है जिसके तट पर नागों ने अपना साम्राज्य स्थापित किया। नागों ने भी इंद्रावती को अपनी मां मानकर इसके तट पर ही अपनी राजधानियां स्थापित की थी। 

इंद्रावती नदी  गोदावरी नदी की सहायक नदी है। इस नदी का उदगम स्थान उड़ीसा के कालाहन्डी जिले के रामपुर थूयामूल में है। नदी की कुल लम्बाई 240 मील  है। जगदलपुर के पास ही विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात का निर्माण करती है। इतना चैड़ा झरना पुरे एशिया में कहीं नहीं है। विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात बस्तर को इंद्रावती का अनमोल उपहार है। 


धने जंगलों में बहती हुई इंद्रावती बारसूर को प्राचीन राजधानी का स्वरूप देती है। सातधाराओं मंे बंटकर इंद्रावती सतरंगी इन्द्रधनुष बनाकर लोगों के दिलो दिमाग पर राज करती है। भैरमगढ़ के पास इंद्रावती अबूझमाड़ की ओर मुड़ जाती है। माड़ के घने जंगलों में में माड़ियां आदिवासियों के साथ लाखो पशु पक्षियों के जीवन की एकमात्र सहारा बन जाती है।


महाराष्ट्र और बस्तर की सीमा निर्धारित करते हुये भोपालपटनम के पास बेहद ही विशाल रूप धारण कर लेती है। माड़ के जंगलो में गहरी खाईयों से होकर पुरे वेग से इंद्रावती आगे बढ़ती है वहीं भोपालपटनम के पास इंद्रावती धीरे धीरे कदमों से आगे बढ़ती है। यहां वियोग का मार्मिक दृश्य उत्पन्न होता है। इंद्रावती भद्रकाली से थोड़ी दुर आगे गोदावरी में विलीन हो जाती है। 


कोंटा से कुछ आगे बस्तर की दुसरी नदी शबरी भी गोदावरी में विलीन होती है। गोदावरी की दोनों बेटियां इंद्रावती और शबरी बस्तर की धरती को नया जीवन दान देती है। 

इन्द्रावती की प्रमुख सहायक नदियों में कोटरी निबरा बोराडिग नारंगी उत्तर की ओर से तथा नन्दीराज चिन्तावागु इसके दक्षिण एवं दक्षिण.पूर्वी दिशाओं में मिलती हैं। दक्षिण.पश्चिम की ओर डंकनी और शंखनी इन्द्रावती नदी में मिलती हैं। 

इंद्रावती सदा स्वच्छ रहे इसका दायित्व हम सभी का है। हमें अपने स्तर पर भी इंद्रावती को प्रदूषण से मुक्त बनाये रखना है। इंद्रावती के प्रति यही हमारी सच्ची कृतज्ञता है। 

आलेख ओम सोनी दंतेवाड़ा

17 दिसंबर 2018

बस्तर का अनजाना सा तोयर झरना

बस्तर का अनजाना सा तोयर झरना......!

शानदार मनमोहक झरनों से बसी हुई दुनिया कोई है तो वह बस्तर ही है। हर दस किलोमीटर में एक झरना अपनी कलकल ध्वनि से पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करता है। ऐसा ही एक झरना है तोयर जलप्रपात जो कि सिर्फ आवाज से ही अपनी ओर लोगों को खींचता है। 

झाड़ियों की झुरमूट से ही इस निर्झर की आवाज कानो तक पहुंचती है। जब झाड़ियो में बनी पगड़डी से आगे बढ़ते है तब इसे झरने के पूर्ण सौंदर्य का दीदार हो पाता है। 

50 फीट की उंचाई लिये यह झरना बेहद ही खुबसूरत है। चारो तरफ धने जंगलो से घिरा यह झरना जंगल में मधुर संगीत सुनाता है। अधिक प्रचार प्रसार ना होने के कारण बहुत ही कम लोग इस झरने की सुंदरता से परिचित है। 

दंतेवाड़ा से कटेकल्याण फिर थोड़ा आगे परचेली के पास ही तोयनार ग्राम है इस ग्राम में ही तोयर नाले पर बना यह तोयर झरना है। कम उंचाई होने के बावजूद भी बेहद ही मनमोहक है। बस्ती से बेहद लगा हुआ है फिर घनी झाड़ियों के कारण नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। झरने के उपर एक छोटी सी गुफा है। 

इस झरने को प्रकाश में लाने का श्रेय मेरे मित्र जितेन्द्र नक्का को है। उन्होने ही मुझे इस झरने के बारे में बताया था। कटेकल्याण से परचेली के रास्ते लगभग 12 किमी और बस्तर जिले के छिंदावाड़ा से 17 किमी दूरी पर यह जलप्रपात स्थित है।कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान से लगा हुआ होने की वजह से यहां की जलवायु भी एक समान है। दरभा-कटेकल्याण स्टेट हाईवे पर तीरथगढ़ ग्राम से यह स्थान लगभग 17 किलोमीटर दूर है।

वैसे इस झरने में अप्रैल तक पानी रहता है। दंतेवाड़ा से कटेकल्याण होते हुये तीरथगढ़ जाने पर आप पोन्दुम झरना, तोयर झरना और चिंगीतराई के ऐतिहासिक मंदिर के दर्शन करते हुये नीजि वाहन से कभी भी जा सकते है।

10 दिसंबर 2018

अंतागढ़ का चर्रे मर्रे झरना

अंतागढ़ का चर्रे मर्रे झरना..............!

बस्तर में हर जगह झरने ही झरने है। बस इन्हे खोजने वाला साहसी पर्यटक की जरूरत है। बस्तर के सातों जिले में कई झरने है। जगदलपुर में चित्रकोट तीरथगढ़ तो दंतेवाड़ा में हांदावाड़ा, फूलपाड़ जैसे बड़े झरने है।


नारायणपुर जहां अपनी अबूझमाड़ियां संस्कृति के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध है वहीं नारायणपुर प्राकृतिक दृश्यों से भी संपन्न है। नारायणपुर में कई झरने है जो आज भी पर्यटकों की नजरों से ओझल है। 

नारायणपुर के प्रसिद्ध जलप्रपातों में एक है  चर्रे मर्रे जलप्रपात। चर्रे मर्रे  नारायणपुर जिले के अंतागढ़-आमाबेड़ा वनमार्ग पर पिंजारिन घाटी में स्थित है ।इस जलप्रपात की खासियत ये है कि यहां का कलकल करता झरना पर्यटकों को साल भर आकर्षित करता है।  

उत्तर पश्चिम दिशा में जलप्रपात का गिरता हुआ पानी अलग-अलग कुंडों के रूप में एकत्रित होकर दक्षिण दिशा में लंबा फासला तय कर कोटरी नदी में मिलता है.

चर्रे मर्रे  का सुन्दर झरना कांकेर में अन्तागढ़ से 17 किमी की दूरी पर स्थित है। आमाबेड़ा के रास्ते पर एक चर्रे मर्रे नाम का स्थान पड़ता है। यह झरना जोगीधारा नदी पर बनता है। इस झरने की ऊँचाई लगभग 20 मीटर है। 

यह झरना ज्यादा उंचा तो नही है परन्तु उबड खाबड चटटानों से नदी का गिरता पानी मनमोह लेता है। आसपास की हरितिमा नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करती है। यह प्रमुख पिकनिक स्पॉट भी है। जुलाई से लेकर फरवरी माह तक चर्रे मर्रे झरने के सौंदर्य का आनंद लिया जा सकता है। 

कांकेर से सड़क मार्ग से कुल 85 किलोमीटर दुरी पर है। नीजि वाहन से यहां पहुंचा जा सकता है। 

8 नवंबर 2018

अनजाना सा फूलपाड़ जलप्रपात

अनजाना सा फूलपाड़ जलप्रपात......!

दंतेवाड़ा जलप्रपातों का जिला है। यहां छोटे बड़े उंचे लंबे अनेकों झरने है। इन झरनों में पालनार के पास का फूलपाड़ झरना जिले का सबसे उंचा झरनो में से एक है। अनुमान तो यह भी है कि फूलपाड़ दंतेवाड़ा का सबसे उंचा झरना है। इसकी उंचाई 150 फीट तक है। 


दंतेवाड़ा के कुआंकोंडा ब्लाक के पालनार ग्राम के समीप ही फूलपाड़ ग्राम है। इस फूलपाड़ ग्राम के पास  ही फूलपाड़ झरना है। यहां जाने के लिये फूलपाड़ तक पक्की सड़क बनी हुई है। फूलपाड़ से दो किलोमीटर तक कच्ची सड़क में दो पहिया या चारपहिया वाहन से यहां पहुंचा जा सकता है। 


यह एक बेहतरीन पिकनिक स्थल है। बैलाडीला पर्वतश्रृंखला से निकलती यह नदी फूलपाड़ झरना बनाते हुये सुकमा के पास शबरी नदी में मिल जाती है। फूलपाड़ जलप्रपात में कल कल बहती मधुर धाराये, दुर दुर तक फैली पादप हरितिमा, मन को बड़ा सुकून देती है। 


झरने के उपर एवं नीचे जाने के लिये पक्की सीढ़िया बनी हुई है। सामने की छोटी सी पहाड़ी पर पूर्ण झरने को देखने के लिये व्यू र्पाइंट भी बना हुआ है। नीचे उतर कर पूर्ण झरने के देखने से इसकी उंचाई का अहसास होता है। झरने के नीचे घना जंगल है। 


जंगल से होते हुये झरने तक पहुंचने में भी एक अलग आनंद है। झरने के पास पहुंचने के लिये नदी में दिखते पत्थरों पर संभल कर जाना होता है। ठंड के दिनों में तो फूलपाड़ में पिकनिक मनाते लोगों के कई समूह दिखाई देते है। कुल मिलाकर फूलपाड़ जलप्रपात के बेहतरीन पिकनिक स्पाट और दर्शनीय स्थल है। 

दंतेवाड़ा से कुल दुरी 60 किलोमीटर है।  जुलाई से लेकर अप्रैल तक फूलपाड़ के झरने की आनंदमयी खुबसूरती को निहारा जा सकता है। 

8 अक्टूबर 2018

मलकानगिरी सत्तीगुड़ा डेम

मलकानगिरी सत्तीगुड़ा डेम.....!

वैसे तो मलकानगिरी ओडिसा का सीमावर्ती नगर है। दक्षिण बस्तर सुकमा से इसकी दुरी मात्र 30 किलोमीटर ही है। शबरी नदी के उस पार ओडिसा में मलकानगिरी नगर है। 



शबरी पार करते ही ओडिया संस्कृति दिखनी प्रारंभ हो जाती है। ग्राम खेत नदी तालाब पहाड़ सभी में ओडिसा संस्कृति साफ साफ झलकती है। मलकानगिरी में वैसे तो बहुत से टुरिस्ट स्पाट है। ओडिसा शैली में निर्मित बहुत से भव्य मंदिर है। 


किन्तु बस्तर सुकमा दंतेवाड़ा वालों का मलकानगिरी जाने का मुख्य उद्देश्य मलकानगिरी का सत्तीगुड़ा बांध देखना होता है। सत्तीगुड़ा का डेम सुकमा वासियों के लिये पसंदीदा पिकनिक स्थल है। सत्तीगुड़ा डेम एक छोटा सा कृत्रिम बांध है जो कि मलकानगिरी से 08 किलोमीटर की दुरी पर है। 



यहां के दृश्य बेहद ही खुबसूरत है। आसपास की उंची पहाड़ियां और नीले नभ में विचरते श्वेत बादलों की परछाई बांध के जल में देखने का आनंद ही कुछ और है। हालांकि बांध ज्यादा बड़ा तो नहीं है फिर भी यह बेहतर पिकनिक स्थल है। परिवार सहित घुमने के लिये सुकमा के पास मलकानगिरी का सत्तीगुड़ा डेम एक आदर्श स्थल है। 
......ओम सोनी। 

1 सितंबर 2018

अनजाना बस्तर- पोन्दुम झरना

अनजाना बस्तर- पोन्दुम झरना......!


बस्तर की खोज कभी ना खत्म होने वाली खोज है। बस्तर को जितना जानने की कोशिश करेंगे उतनी नयी जानकारी पाओगे, जितना बस्तर में घुमोगे उतना ही बस्तर की अनजानी जगहों को देखने का मौका मिलेगा। बस्तर में प्रकृति ने झरनो, जंगलो, पुराने मंदिरों, रीति रिवाजों के साथ अपनी अनुपम छटा बिखेरी है। 



झरने तो बस्तर में अनगिनत है। इन झरनो ने बस्तर को दुनिया भर में मशहूर किया है। पर्यटकों में बस्तर के झरने देखने की ललक इतनी है कि वे हजारों किलोमीटर दुर से इन्हे देखने आते है। 

कुछ झरने आज मशहूर पर्यटन केन्द्र बन गये है और कुछ आज भी पर्यटकों की नजरों से ओझल है। ऐसा ही एक अनजाना सा झरना है पोन्दुम झरना। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से कटेकल्याण मार्ग पर 08 किलोमीटर की दुरी पोन्दुम नामक छोटा सा ग्राम है। 


इस गांव के बाहर ही मुख्य सड़क से दाये तरफ एक कच्चा मार्ग झरने की तरफ जाता है। सड़क से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद झरने तक पहुंचा जा सकता है। मार्ग मे अत्यंत छोटी सी पहाड़ी है जहां से झरने की मधुर कल कल ध्वनि सुनाई देती है। 

यह झरना एक नाले पर है। इसकी उंचाई 50 से 60 फिट तक है। झरना आकार में भले ही थोड़ा छोटा है परन्तु यहां का प्राकृतिक दृश्य बहुत ही मनमोहक है। उपर नीला आसमान, कल कल बहती धाराये, चारां तरफ फैली कुश की झाड़ियां ये दृश्य मन को आनंदित कर देते है।


यह पोन्दुम झरना पिकनिक के लिये आदर्श स्थल है। दंतेवाड़ा से सबसे पास पोन्दुम का झरना है जिसे पर्यटन केन्द्र के रूप  में विकसित किया जाना चाहिये। झरने तक जाने के लिये पक्की सड़क एवं जानकारी सूचक बोर्ड लगाये जाने चाहिये। इस पोन्दुम को दंतेवाड़ा के पर्यटन नक्शे में शामिल कर प्रमुखता से प्रचारित किया जाना चाहिये। जुलाई से लेकर मार्च तक इस झरने की खुबसूरती को बिना भय के निहारा जा सकता है.....ओम।