23 दिसंबर 2019

झुलन दरहा मे झुलता पानी

झुलन दरहा मे झुलता पानी...!

काँगेर घाटी वन सम्पदा एवं दुर्लभ जीव जन्तुओ से तो बेहद सम्पन्न है. इसके साथ ही काँगेर घाटी अपने अंदर झरनो की अनदेखी खूबसूरती को भी छिपाये हुए हैं. काँगेर घाटी के घने जंगलो मे आज भी कई ऐसे छोटे मोटे झरने है जिसकी जानकारी आज भी बेहद कम लोगों को है.

काँगेर घाटी मे ऐसा ही एक झरना है झुलन दरहा. हाल ही में यह झरना आम पर्यटको के सामने आया है.झुल झुल कर दरहे मे गिरता यह झरना बेहद ही खूबसूरत स्थल है. तीरथगढ की तरह सीढीदार पत्थरो से गिरती कल कल ध्वनि प्रकृति की स्वर लहरियो के साथ अद्भुत ताल मेल बनाती है.
झुला झुले पानी ऐसा अहसास इस झरने की अनोखी खासियत है.माँडू का हिन्डोला महल और काँगेर घाटी का झुलन दरहा दोनों ही तन मन मे झुला झुलने का अनुभव कराते है.
यह झुलन दरहा बेहतरीन पर्यटन स्थल है एवं परिवार सहित वन भ्रमण कार्यक्रम के लिये आदर्श स्थल है.
ओम...!
शानदार छायाचित्र के लिए मुन्ना बघेल जी का बहुत आभार...!

6 दिसंबर 2019

कांगेर घाटी का चिकनर्रा जलप्रपात


कांगेर घाटी का चिकनर्रा जलप्रपात.....!

बस्तर के अनजानी खूबसूरती का सबसे नायाब खोज चिकनर्रा झरना है. हाल ही में बाहरी दुनिया के सामने लाया गया चिकनर्रा झरना कांगेर घाटी का नया पर्यटन स्थल है. लगभग 40 फ़ीट उंचाई लिये यह झरना बेहद ही मनमोहक है. कांगेर घाटी मे दुर दुर तक फ़ैले जंगलो मे चिकनर्रा की कल कल ध्वनि संगीत के नये नये राग छेड़ती है.



तीरथगढ की तरह सीढीदार रास्तो से होकर जलधारा कहीं दुर घने जंगल मे खो जाती है. कुण्ड की गहराई मे मचलती मछलिया और आसमान मे उडते परिन्दो का का आनंद मय दृश्य आँखो के सामने नृत्य करते रहता है. बेहद ही खूबसूरत इस झरने की बात ही निराली है.

इस शानदार तस्वीर के लिये मुन्ना बघेल जी का बहुत बहुत आभार

29 नवंबर 2019

रमणीय "आमा दरहा जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 05
रमणीय "आमा दरहा जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला


इस तरह ०१ सितम्बर २०१९ के दिन को मेरी यादगार सफर का अंत हुवा ! आखिर में जब हम लोग (श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर, श्री बलवंत पैकरा सर और मैं) वापस केशकाल के लिए लौटने लगे, तब हमे श्री सोरी एवं पैकरा सर ने बताया की ग्राम बटरली के घाट वाले रोड के कुछ पहले आमा नाला में दो और झरने बनते हैं, जो की पूर्णतः बरसाती झरने हैं तथा ग्रीष्म ऋतू के आगमन होते होते सुख जाते हैं, वरन वर्षा ऋतू एवं शरद ऋतू में इनका सौंदर्य अकल्पनीय, अकथनीय, अवर्णनीय होता है! वैसे यह नाला(पूर्णतः कुवेमारी-बावनिमारी ग्राम पंचायत से लगा क्षेत्र) घाट के तेज खड़ी ढाल का अनुसरण करता है ! यही कारण है की आमा नाला पर हमे २-३ से अधिक रमणीय जलप्रपातों के अवलोकन होते हैं!

आमा नाला इस स्थान पर लगभग लगभग १५ फिट से गिरकर एक सुन्दर झरने का निर्माण करता है, जिसे आज तक कोई नाम नहीं दिया गया है, पर आमा नाला की खाई पर बनने के कारण इसे आमा दरहा भी कहा जाता है! कुछ ग्रामीण लिमदरहा झरने के नज़दीक होने के कारण इसे लिमदरहा द्वितीय - लिमदरहा तृतीय झरना भी बुलाते हैं! प्रथम झरने की गहरायी लगभग ३५-४० फिट की है, किन्तु इसके निचे उतरने का रास्ता अत्यंत दुष्कर है! सभी तरह से उर्ध्वाधार किनारों के कारण हम लोग निचे नहीं उतर पाए !


द्वितीय झरना लगभग १५ फिट ऊँचा है तथा इस जगह निचे उतरकर काफी दूर तक झरने से बहते आमा नाले के जल को ट्रेक किया जा सकता है! जलप्रवाह का मार्ग पूर्ण रूप से पाषाण बाधित रह्ता है, अतः यह स्थान आपके trekking skills की अच्छी परीक्षा लेगा !
Last but not the least, अंत में मैं श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर एवं श्री बलवंत पैकरा सर का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी अनुभव यात्रा सफल हो सकी !
केशकाल से लौटकर जितेन्द्र नक़्क़ा

"उपरबेदी जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 04
 "उपरबेदी जलप्रपात", केशकाल, कोंडागांव जिला


कभी सुना है ऐसा जलप्रपात जहां पहुंचना इतना दुश्वार हो जाए, की आपको उसके दीदार के लिए निचे उतरने का स्थान ही ना मिले, उपरबेदी ऐसी ही एक जगह है, जहां एक झरना खोजने जाओ, तो दो-तीन झरने और मिलने चालू हो जाते हैं, बस रास्ते ही नहीं मिलते !

केशकाल से बटराली होते हुवे जब हम लोग (श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर, श्री बलवंत पैकरा सर और मैं) कुवे-मारी पार करते हुवे उपरबेदी ग्राम पहुंचे, तब हमे निकट के ग्रामीणों ने बताया की यहां एक छिपा हुवा झरना है, जिसे "उपरबेदी जलप्रपात" कहा जाता है! यहाँ स्थानीय नाला लगभग ४०-५० फिट निचे गिरकर एक अत्यंत मनोरम निर्झर का निर्माण करता है ! इस नाले का जल जिस खाई में गिरता है, उसके ठीक सामने एक बड़ी और गहरी वादी चारो ओर से नज़र आती है ! वादी भी इतनी गहरी और खड़ी उतरन वाली की अच्छे अच्छों के होश फाख्ता हो जाएँ ! हम लोग निचे जाने का रास्ता ढूंढते रह गए, और गलती से एक और अनदेखे झरने के दीदार हो गए ! इसे कहते हैं एक के दाम में दो (फायदे) !
उपरबेदी झरने के दो सोपान हैं, जिसमे से प्रथम सोपान अधिकतम ८-१० फिट ऊँचा है, जिसके बाद का सोपान मुख्य सोपान है, और लगभग ४०-५० फिट ऊँचा है! यह प्राकृतिक स्थल इतना ख़ूबसूरत है की इसके सामने मानव-निर्मित सबसे सुन्दरतम रचना भी फीकी लगने लगे !
केशकाल से लौटकर जितेन्द्र नक़्क़ा

स्वर्ग सा सुन्दर मुत्ते खडका जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER NO. 03
स्वर्ग सा सुन्दर मुत्ते खडका जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव


मुत्ते खडका के बारे में मैंने आज से पहले बस्तर के प्रसिद्द लेखक एवं शिक्षाविद डॉक्टर सुरेश तिवारी जी की पुस्तक “बस्तर-पर्यटन, संस्कृति और इतिहास” में पढ़ा था ! उनकी कुशल लेखन शैली और प्रभावी वर्णन से मै इतना प्रभावित हुवा की मैंने तब से यह तय किया था की कभी ना कभी इस आश्चर्य के दीदार जरूर करूँगा! "मुत्ते खड़का" शब्द गोंडी भाषा से लिया गया माना जाता है, जिसमे मुत्ते का अर्थ औरत से है और खड़का का अर्थ खाई में गिरते पानी से है, अर्थात ऐसी अनोखी खाईनुमा जगह जहां कोई औरत दूध के समान सफेद निर्मल जल गिरा रही हो।


यह क्षेत्र कुवे-मारी ग्राम पंचायत क्षेत्र के निकट स्थित मडगाव नामक ग्राम के बाहरी क्षेत्र से प्रवाहित होते नाले पर बनता है ! यहां का स्थानीय नाला लगभग 35 फिट से गिरकर एक बहुत ही रमणीय जलप्रपात का निर्माण करता है ! इसकी विशेषता प्रपात के ठीक नीचे स्थित पाषाण हैं, जिनके आकार कुछ बड़े-कुछ छोटे इस तरह से प्रपात को घेरे हुवे हैं, की प्रपात का जल इन पर इतनी जोर से गिरता है कि पूरे क्षेत्र में जल कणों की फुहारें उठाने लगती हैं और आसपास खड़ा हर व्यक्ति इसे तर-बतर हो जाता है। मुख्य सोपान में प्रपात लगभग 35 फिट गिरकर प्रथम सोपान बनाता है, उसके नीचे का द्वितीय सोपान प्रथम सोपान से लगभग 300 फिट दूर तकरीबन 6-7 फिट गिरकर द्वितीय सोपान बनाता है।


प्रपात के ऊपर का भाग जहां से स्थानीय नाले का जल प्रपात बनकर नीचे उतरता है, वह स्थान भी काफी रमणीय है एवं इस स्थान से सारा निकटस्थ वनाच्छादित क्षेत्र दिखाई पड़ता है, जो कि बहुत ही दर्शनीय लगता है। यहां बैठकर कोई भी व्यक्ति आराम से पिकनिक बना सकता है।
इस स्थान पर पहुचने का पहुच मार्ग भी काफी दुर्गम है एवं स्थानीय सहायता के बगैर इस स्थान का पता लगाना थोड़ा दुष्कर हो सकता है। यह प्रपात बस्तर के सुप्रसिद्ध जलप्रपातों की सूची में अपना नाम दर्ज कराने का माद्दा रखता है। क्योंकि इस स्थान पर पहुचने के बाद भी नीचे उतरने इतना आसान नही है, इसके लिए आपको अच्छे tracking skills की जरूरत पड़ेगी, तो इस नाते यह स्थान ट्रेकिंग के लिए सर्व उपयुक्त है।
अंत में पूर्व की भांति मैं श्री कैलाश बघेल, श्री टीकम सोरी सर्, श्री पैकरा सर का धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी।

"मिरदे जलप्रपात" (केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव)

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER 02
 "मिरदे जलप्रपात" (केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव)


पिछला रविवार मेरे लिए यादगार रहा! जहां कोंडागांव जिला जाना हुवा, वहीँ अनेकों आश्चर्यों से भी सामना हुवा! श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी के साथ जैसे ही लीमदरहा जलप्रपात देख कर हम आगे बढे! यह निश्चित हुवा की अगले आश्चर्य के रूप में हम लोग मिरदे जलप्रपात से मुखातिब होंगे !


मेरे लिए तो सभी नाम नए और जगह अनजान थी, पर अनजाने आश्चर्यों का सामना करने की अनुभूति ही अलग होती है ! मेरे लिए यह काफी शिक्षाप्रद और चुनौतीपूर्ण था!



बावनीमारी ग्राम से आगे बढ़ते हुवे हम लोग कुवे-मारी ग्राम पहुंचे, जिसके निकट ही लगभग ०२ किलोमीटर जाने पर वहां का स्थानीय नाला(ग्रामीण इस नाले को मिरदे नाला के नाम बुलाते हैं!) लगभग ७० फिट निचे सीढ़ीनुमा अंदाज में गिरकर एक नयनाभिराम प्रपात का निर्माण करता है, जिसे ग्रामीण मिरदे जलप्रपात के नाम से बुलाते हैं! यह जलप्रपात इतना ख़ूबसूरत और ऊँचा है की जहां प्रपात के ऊपर से सारा निकटवर्ती क्षेत्र दिखलाई पड़ता है! वहीँ निचे उतरने पर सीढ़ीनुमा अंदाज में गिरती जलधारा निचे के सोपानों में और चौड़ी नज़र आने लगती है ! 

ऊपर से निचे की ओर गिरती जलधारा को देख कर ऐसा लगता है मानो किसी ने जल की धारा नहीं बल्कि दूध की धारा बहा दी हो! आखिरी सोपान की ऊँचाई ३०-३५ फिट और ढलान ६० डिग्री की है, जिसे साहसी पर्यटक चढ़ने की कोशिश कर सकते है! इसके ऊपर के सोपान सीधे उर्ध्वाधार है, जिनके लिए कोई अनुभवी पर्वतारोही ही उपयुक्त होगा! यह स्थान ट्रैकिंग के लिए अतिउपयुक्त है, जहां प्रपात के निचले भाग में पहुंचने का मार्ग अत्यंत दुर्गम है, पास की ढलान वाली चट्टानों को पगडंडी बनाकर निचे उतरना पड़ता है, जो काफी रोमांचक, चुनौतीपूर्ण और साहसिक होता है !
यह एक बारहमासी जलप्रपात है और निकटस्थ ग्रामीणों में प्रसिद्ध है, परन्तु कुवेमारी ग्रामपंचायत से बाहर विरले ही इसके बारे में जानकारी रखते हैं! बारहमासी झरना होने के कारण यहां सदैव जल रहता है, परन्तु ग्रीष्मकाल में इसका सौंदर्य क्षीण हो जाता है !
आभार: अंत मे मै श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी !
कोंडागांव जिले से लौटकर जितेंद्र नक़्क़ा

लीम दरहा जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव

KONDAGAON DIARIES: CHAPTER 01
लीम दरहा जलप्रपात, केशकाल क्षेत्र, कोंडागांव


शोध का एक नियम होता है ! पहले विषय चयन, फिर साहित्य अवलोकन, फिर कार्यप्रणाली, फिर कार्य! आज मेरे लिए भी वैसा ही मौका था! हमेशा मेरे दिल में ख्याल आता था, जिस जगह का एक घाट(केशकाल घाट) ही इतना सुन्दर है, की छ.ग. के सबसे सुन्दर घाट में से गिना जाता है, क्या ऐसे सुन्दरतम स्थल में और आश्चर्य नहीं होंगे? क्या वहां और दर्शनीय स्थल          नहीं होंगे ?
मेरे एक सहयोगी श्री कैलाश बघेल ने मुझे इस रविवार कोंडागांव आमंत्रित किया ! मेरे लिए यह प्रस्ताव काफी उत्साहजनक था, क्यूंकि आज मुझे मेरे सवालों के जवाब मिलने वाले थे ! तय तो यह था जगदलपुर से केशकाल आते हुवे हम लोग दाए मुड़ेंगे, पर केशकाल से हमारे साथ पथप्रदर्शक के तौर पर जुड़े दो शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी ने हमारी दिशा ही बदल दी !

यहां से हमारा रोमांचक सफर चालू हुआ ! सर्वपप्रथम हम लोगों ने ग्राम बटराली होते हुवे केशकाल क्षेत्र के मारी क्षेत्र में प्रवेश किया! “मारी” शब्द का अर्थ है पठार या पाट क्षेत्र, जिसके चारों तरफ सकरे एवं पूर्ण ऊर्ध्वाधार किनारों के कारण इस क्षेत्र के नाले पहाड़ों/चट्टानों से उतरकर अप्रितम, अद्भुत, अविस्मरणीय जलप्रपात बनाते हैं!
लीम दरहा जलप्रपात का ‘नाम इस सूची में सबसे पहले आता है! आमा नाला नामक नाले का जल बावनीमारी ग्राम के निकट लगभग २५ फिट से गिरकर इस नयनाभिराम प्रपात का निर्माण करता है! यह जलप्रपात इतना ख़ूबसूरत है की जहां प्रपात के ऊपर से सारा निकटवर्ती क्षेत्र दिखलाई पड़ता है! वहीँ निचे उतरने पर ३०-३५ फ़ीट चौड़े एवं २०-२५ फ़ीट ऊँचे प्रपात के अवलोकन होते हैं! प्रपात का जल ठीक निचे गिरकर एक गोलाकार कुंड का निर्माण करता है!
आप लोगों को यह स्पष्ट कर दूँ की यह बारहमासी प्रपात इतना अल्पज्ञात है की बावनीमारी पंचायत के बाहर किसी को इस अद्भुत स्थान के बारे में जानकारी नहीं है ! बारहमासी झरना होने के कारण यहां सदैव जल रहता है, परन्तु ग्रीष्मकाल में इसका सौंदर्य क्षीण हो जाता है !
आभार: अंत मे मै श्री कैलाश बघेल, शिक्षकगण श्री बलवंत सिंह पैकरा एवं श्री टीकम सोरी जी का ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूंगा, जिनके कारण मेरी यह यात्रा सफल हो सकी !
कोंडागांव जिले से लौटकर जितेंद्र नक़्क़ा

3 अगस्त 2019

अविश्वसनीय चित्रकोट

अविश्वसनीय चित्रकोट .......!
चित्रकोट जलप्रपात आज पुरी दुनिया में बस्तर की पहचान बन चुका है। इस झरने की विशालता ने दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। इसकी जलधाराओं की गर्जना ने पर्यटको को रोमांचित किया है।
इसकी असीम खुबसूरती ने पर्यटकों को भाव विभोर कर दिया। अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो बस यही है इस बात को चित्रकोट जलप्रपात अपनी खुबसूरती और विशालता से प्रमााणित करता है।
इंद्रावती नदी की करोड़ों बुंदो की जलधारायें नब्बे फीट की उंचाई से जिस गर्जना के साथ गिरती है उसकी आवाज पर्यटकों के धड़कनों को तेज कर देती है। उस गर्जना को सुनकर देखकर कोई भी सैलानी बिल्कुल अवाक रह जाता है। उसके मुख से सिर्फ एक ही शब्द निकलता है वाह चित्रकोट वाह।


चित्रकोट का झरना आज पुरी दुनिया में मशहूर है। इसके पीछे का कारण इसकी खुबसूरती और इसकी विशालता है। यह झरना जगदलपुर से 30 किलोमीटर की दुरी पर चित्रकोट ग्राम में स्थित है। बस्तर की प्राणदायिनी इंद्रावती पर बना यह झरना लगभग 90 फीट की उंचाई से गिरता है। यह झरना ना केवल भारत वरन एशिया का सबसे चौड़ा झरना है।
इसकी चौड़ाई आधे किलोमीटर से भी ज्यादा लगभग 750 मीटर तक मापी गई है। पुरे विश्व में नियाग्रा जलप्रपात की चौड़ाई सबसे अधिक है। उसके बाद दुसरे नंबर का खिताब चित्रकोट को हासिल है और पुरे एशिया महाद्वीप में चित्रकोट झरने की चौड़ाई का कोई भी झरना नहीं है इस कारण चित्रकोट झरने को एशिया का नियाग्रा जलप्रपात भी कहा जाता है। इसका आकार घोड़े की नाल के समान है।
वर्ष भर में चित्रकोट के अनेकों रूप देखने को मिलते है। मानसून के दिनों में नदी में अत्यधिक जलराशि के कारण यह झरना अपनी विशालता के चरम पर होता है। शीतकाल में इसकी कई जलधारायें रजत मोतियों की धाराओं के रूप में गिरती है।
चांदनी रात में तो चित्रकोट की खूबसुरती का कहना ही क्या, सैलानी तो सारी रात जलधाराओं के सौंदर्य को देखते हुए ही गुजार देता है। पहली बार जिस किसी ने भी चित्रकोट झरने को देखा है उसके दिलो दिमाग में कई दिनों तक सिर्फ चित्रकोट की छवि ही घुमते रहती है।
वहीं ग्रीष्मकाल में दो धारायें ही चित्रकोट का नाम कायम रख पाती है। इस साल अत्यधिक गर्मी, और इंद्रावती में बने हुए बांधों के कारण चित्रकोट का झरना सुख गया था। जहां तक लोगों को ज्ञात है कि ऐसी भयावह स्थिति पहली बार देखने को मिली थी।
जनवरी के बाद से नीचे बने गहरी झील में स्थानीय नाविकों द्वारा नावे और डोंगियां चलाई जाती है। इन नावों की सवारी करते हुए पर्यटक जब जलधाराओं के पास पहुंचता है तब जलधाराओं की फुंहारे तन और मन दोनों को ही शीतल कर देती है।
सूर्य की रोशनी भी चित्रकोट की धाराओं के साथ ऐसा तालमेल बैठाती है कि पानी की हर बुंदों में इंद्रधनुष के सातो रंग निखर उठते है। चित्रकोट के पास ही भगवान शिव को समर्पित मंदिर है।

चित्रकोट का झरना प्राकृतिक सौंदर्य के साथ भक्ति रस अपने में समाहित करते हुए सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। क्या बुढ़ा, क्या बच्चा, क्या पुरूष और क्या महिला, सभी इसकी सुंदरता के कायल है। बस्तर के सभी निवासियों के दिलों में चित्रकोट का झरना राज करता है।
इस चित्रकोट के झरने की विशालता विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर खिंचती है। हर साल देश विदेश के कोने कोने से हजारो सैलानी चित्रकोट के सौंदर्य को निहारने आते है। तो अब आप कब आ रहे है चित्रकोट ..............!

21 जून 2019

तिरिया के झरने

तिरिया के झरने
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तिरिया के झरने