21 मई 2020

"भगवान सूर्य" की सजीव प्रतिमा

"भगवान सूर्य" की सजीव प्रतिमा....!
शिल्पी ने प्रतिमा का निर्माण पुरा मन लगाकर किया है जिससे प्रतिमा ऐसी जीवन्त बन गयी है कि लगता है भगवान सूर्य अभी अपने नेत्र खोलकर पुरे संसार मे ऐसी रोशनी बिखेर देगे जिससे हर प्राणी मात्र तृप्त हो जायेगा. एक ग्राम मे अपेक्षित इस सजीव प्रतिमा के मुख मण्डल मे ऐसा आकर्षण बस्तर के किसी प्रतिमा मे देखने को नहीं मिला. यह जीवित सी लगने वाली प्रतिमा भगवान सूर्य की है. प्रतिमा मे दोनो हाथ खंडित है किन्तु कन्धे पर कमल की कलियों के अंकन से प्रतीत होता है कि दोनों हाथो मे सनाल कमल कलियाँ धारित रही होगी.
चरणो मे भगवान सूर्य की अन्य प्रतिमाओ की तरह लम्बे बूट का अभाव है. हालाकि नाग शासन काल मे निर्मित यह प्रतिमा प्रकृति और उपेक्षा की मार से क्षरित हो गयी है तथापि इसके मुख मण्डल का अप्रतिम सौन्दर्य अभी भी काफी प्रभाव शाली है. सिर पर मुकुट धारण किये और कानो मे बड़े बड़े कुण्डल पहने हुए सूर्य देव की प्रतिमा रौद्र एवं सौम्यता का मिश्रित भाव लिये हुए है. एक तरफ अधिक क्षरित होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान सूर्य क्रोधित है एवम वही दुसरी तरफ से सौम्यता का भाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है. उस शिल्पकार को नमन जिसने इस जीवन्त प्रतिमा का निर्माण किया.
ओम्
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18 मई 2020

बस्तर मूर्ति शिल्प की अनमोल धरोहर- बारसूर का चन्द्रादित्य मंदिर

बस्तर मूर्ति शिल्प की अनमोल धरोहर- बारसूर का चन्द्रादित्य मंदिर......!

आज विश्व धरोहर दिवस के उपलक्ष्य में बारसूर के चन्द्रादित्य मन्दिर की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। बारसूर बस्तर की ऐतिहासिक नगरी है. प्राचीन काल मे बारसूर को नाग राजाओ की राजधानी का गौरव प्राप्त था. इन्द्रावती के तट पर आबाद बारसूर अपने अंदर नागयुगीन अनेक ऐतिहासिक ईमारतो को संरक्षित किये हुए है. 

यहाँ का मामा भांजा मन्दिर, बत्तीस खम्बो पर आधारित युगल शिव मन्दिर,  विशालकाय गणेश प्रतिमाये आज बस्तर की पहचान बन चुकी है.  इसके अतिरिक्त बारसूर का चन्द्रादित्य मंदिर बस्तर की नाग कालीन प्रतिमा शिल्पो की विशिष्टता लिये हुए हैं. 
पुरे बस्तर मे सिर्फ़ चन्द्रादित्य मन्दिर ही एकमात्र ऐसा मंदिर है जिस पर जड़ी हुई प्राचीन मूर्तियाँ आज भी सुरक्षित है. बारसूर मे संग्रहालय परिसर मे किनारे तालाव के तट पर चन्द्रादित्य मंदिर अवस्थित है. भगवान शिव को समर्पित यह मन्दिर गर्भगृह, अन्तराल और मण्डप मे विभक्त है. किसी आक्रमण के कारण इस मंदिर का शिखर पुरी तरह से नष्ट हो चुका है. 
गर्भगृह मे शिव लिंग प्रतिष्ठापित है. गर्भगृह के प्रवेशद्वार के ललाटबिम्ब मे  हरिहर की प्रतिमा अंकित है. मण्डप के अन्दर नन्दी की अलंकृत पाषाण प्रतिमा स्थापित है. मण्डप की दीवारे बेहद ही शादी है. मण्डप पुरी तरह से ध्वस्त हो चुका था, कालान्तर मे इसका जीर्णोदधार कर इसे मूल स्वरुप मे लाया गया.
गर्भगृह की तीनो बाहरी दीवारो पर प्राचीन प्रतिमाये जड़ी हुई है. इनमे शिवपरिवार, विष्णु एवं उनके अवतार, अष्टदिकपाल, शाक्त प्रतिमाये, व्याली अंकन,  मैथुन प्रतिमाये, एवं तत्कालीन समाज के कुछ दृश्यो का अंकन भी प्रतिमाओ में हुआ है. मैथुन प्रतिमाओ के अंकन के कारण इसे बस्तर का खजुराहो भी कहा जाता है.
चक्रकोट के नाग राजा जगदेकभूषण के महामण्डलेश्वर चन्द्रादित्य महाराज ने 1061 इस्वी मे इस शिव मंदिर का निर्माण करवाया था. चन्द्रादित्य के नाम पर यह मंदिर चन्द्रादित्य मंदिर के नाम से जाना जाता है. इस मंदिर के खर्च एवं रख रखाव हेतु चन्द्रादित्य ने महाराज धारावर्ष से गोवर्धननाडू ग्राम खरीद कर अर्पित किया था. 
इस मंदिर के अतिरिक्त चन्द्रादित्य ने चंद्र सरोवर भी खुदवाया था जो आज इस मंदिर से लगा हुआ बारसूर का विशाल बूढा तालाब है. मंदिर , तालाब के अतिरिक्त उसने चन्द्रादित्य बाग भी लगवाया था. इस मंदिर की एक ही जानकारी के दो शिलालेख मिले है.एक तो इस मंदिर से और दुसरा 70 किलोमीटर दुर जाँगला से प्राप्त हुआ है.
नाग कालीन प्रतिमा शिल्प के अध्ययन हेतु यह मंदिर किसी भी शोधार्थी के लिये बेहद ही उपयुक्त है. इसके अतिरिक्त बारसूर मे सोलह खम्भा मन्दिर, पेद्म्मा गुड़ी, हिरमराज मन्दिर भी अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहे है. बारसूर जिला दंतेवाडा के  गीदम नगर से 20 किलोमीटर की दुरी पर है. रायपुर से सडक मार्ग से लगभग 400 किलोमीटर की दुरी पर है.  वही विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट से सिर्फ़ 45 किलोमीटर की दुरी पर है.

3 मई 2019

न्याय की देवी - केशकाल की भंगाराम मांई

न्याय की देवी - केशकाल की भंगाराम मांई ....!

केशकाल मे देवी भँगाराम माई का मंदिर सैकड़ों साल पुराना है. बस्तर मे भंगाराम माई को न्याय की देवी के रूप मे पूजा जाता है.आदिम संस्कृति में कई व्यवस्थायें ऐसी है जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते जिन देवी देवताओं की पूरी आस्था के साथ पूजा अर्चना की जाति है उन्हीं देवी देवताओं को भक्तों की शिकायत के आधार पर सजा भी मिलती है। 

यहां पर देवी देवताओं से वर्ष भर में किये गये कार्यों का हिसाब किताब लेखा-जोखा होता है वहां पर देवी देवताओं को उनके ठीक कार्य नहीं करने पर उसे सजा सुनाई जाती है जो देवताओं के कार्य ठीक रहने पर उसे उच्च कोटी का दर्जा दिया जाता है।
यहां प्रतिवर्ष भादो माह के कृष्णपक्ष के शनिवार के दिन भादो जातरा का आयोजन किया जाता है .जातरा के पहले छः शनिवार को सेवा (विशेष पूजा) की जाती है और सातवें अंतिम शनिवार को जातरा का आयोजन होता है । इस अंतिम शनिवार को जातरा के दिवस क्षेत्र के नौ परगना के देवी देवता के अलावा पुजारी, सिरहा, गुनिया, मांझी, गायता मुख्या भी बड़ी संख्या में शामिल होते है ।
यह मेला शनिवार के दिन ही लगता है, क्षेत्र के विभिन्न देवी देवताओं का भंगाराम मांई के दरबार में अपनी हाजरी देना अनिवार्य होता है । जात्रा के दिन भंगाराम मांई के दरबार पर महिलाओं का आना प्रतिबंधित होता है ।
सभी देवी देवताओं को फुल पान सुपारी मुर्गा बकरा बकरी देकर प्रसन्न किया जाता है वहीं भंगाराम मांई के मान्यता मिले बिना किसी भी नये देव की पूजा का प्रावधान नहीं है । देवी देवताओं के मेला में क्षेत्र व दूरदराज के लोग भी काफी संख्या में उपस्थित होते है ।
नवरात्रि मे बस्तर के नौ देवी मंदिरो की जानकारी के तहत आज आठवी पोस्ट... अधिक से अधिक शेयर करें!

8 फ़रवरी 2019

मुकड़ी मावली के दरबार में होती है प्रेमियों की ईच्छा पुरी

मुकड़ी मावली के दरबार में होती है प्रेमियों की ईच्छा पुरी


प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है की उसे उसका मनचाहा जीवनसाथी मिले परन्तु हर व्यक्ति की यह इच्छा पूरी नहीं होती है। कुछ खुशनसीब होते है जिन्हे उनके मनपसंद जीवनसाथी मिल जाते है। हर प्रेमी जोड़े की ख्वाहिश होती है कि उनका प्रेम अमर रहे, वो दोनों हमेशा साथ रहे। 

परन्तु विभिन्न कारणों से प्रेमी प्रेमिका साथ नही रह पाते है। उनका प्रेम अधूरा रह जाता है। बहुत से प्रेमी प्रेमिका अपने विवाह के लिए विभिन्न तरह के मनौतियां मांगते है। कई तरह के टोटके करते है। मंदिरो में भगवान से प्रार्थना करते है। दंतेवाड़ा में मुकड़ी मावली के समक्ष मांगी गई विनती जरूर पुरी होती है। 

दंतेवाड़ा जिले के छिंदनार ग्राम में प्रचलित एक मान्यता के अनुसार हर वर्ष कई प्रेमी अपने मनवांछित प्रेमिका से विवाह करने के मुकड़ी मावली माता के मंदिर आते है। अपनी प्रेमिका या चहेती लड़की से शादी करने के लिए यहां प्रचलित मान्यता अनुसार उसके बाल या कपडे को पत्थर के नीचे दबाकर रखा जाता है और देवी से बिना रूकावट शादी कराने का निवेदन करते है।

 देवी के शक्ति से नहीं चाहने वाले लड़की तथा उसके परिजनों का विचार बदल जाता है और वे शादी के लिए तैयार हो जाते है। ऐसे सफल प्रेमी हर साल जून में आयोजित जात्रा में आकर देवी को अपनी भेंट चढ़ाते है। इस मंदिर में महिलाओ का जाना वर्जित है।

गीदम से बारसूर मार्ग में स्थित हीरानार से बायीं ओर १७ की. मी. की दुरी पर छिंदनार ग्राम है। इस  छिंदनार ग्राम से बारसूर जाने वाले मार्ग में लगभग चार किलोमीटर की दुरी पर पहाड़ी के नीचे  सैकड़ो वर्ष पुराना एक छोटा सा मंदिर स्थित है। मंदिर काले पत्थर के शिलाओं से निर्मित है। मंदिर में मुकड़ी मावली माता की प्रतिमा स्थापित है। घने जंगलों के मध्य स्थित यह जगह काफी रोमांचकारी है।  किसी जानकार व्यक्ति के साथ यहाँ जा सकते है।

19 दिसंबर 2018

हिड़पाल के भगवान पारसनाथ

हिड़पाल के भगवान पारसनाथ.....!

बस्तर में ग्यारहवी सदी में छिंदक नाग शासक राजभूषण महाराज सोमेश्वर देव ने जैन धर्म को संरक्षण दिया था। उनके शासनकाल में पुरे चक्रकोट राज्य में जैन साधु निवास करते थे। तत्कालीन समय में जैन तीर्थंकरों की बहुत सी प्रतिमायें बस्तर के कोने कोने में स्थापित करवायी गयी थी। 

सोमेश्वर देव की राजधानी कुरूषपाल के आसपास आज भी जैन तीर्थंकरों की बहुत सी प्रतिमायें देखने को मिलती है। उप राजधानी बारसूर में भी कुछ प्रतिमायें संग्रहालय में सुरक्षित है। 


बारसूर के पास ही हिड़पाल नामक छोटा सा वन ग्राम है। बारसूर से 16 किलोमीटर दुर हिड़पाल ग्राम में भालूनाला के पास भगवान पारसनाथ और सिंह पर सवार माता दुर्गा की प्रतिमा रखी हुई थी। स्थानीय ग्रामीण इन्हे भगवान विष्णु और दुर्गा के रूप में पूजा करते आ रहे है। भगवान विष्णु की प्रतिमा वास्तव में 23 वें जैन तीर्थंकर भगवान पारसनाथ जी की है। प्रतिमा में पीछे की तरफ सात फण युक्त सर्प उकेरा गया है। 

ये प्रतिमायें 1982 के आसपास हिड़पाल में कुसुम पेड़ के नीचे रखी हुई थी। पास के गांव वाले इन प्रतिमाओं को उठाकर अपने ग्राम ले जा रहे थे। लेकिन वे इस कार्य में असफल रहे। ग्रामीणों ने इन प्रतिमाओं को भालूनाले के पास ही एक छोटी सी देवगुड़ी में स्थापित कर दिया था। वे सालों से इनकी पूजा अर्चना करते आ रहे है। 


बारसूर जाने से पहले एक कच्चा मार्ग हिडपाल की ओर जाता है। हिड़पाल के घने जंगलों में भालूनाले के पास ही ये प्रतिमायें वर्तमान में एक नवीन मंदिर स्थापित कर दी गई है। हिड़पाल जाने का मार्ग भी घने जंगलों से घिरा हुआ है। 

जिस नाले के किनारे यह मंदिर है वहां भालू पानी पीने आते है जिसके कारण उसे भालूनाला कहा जाता है। ग्यारहवी सदी की ये प्रतिमायें आज भी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ हिड़पाल के जंगलों में सुरक्षित है। किसी जानकार व्यक्ति के साथ हिड़पाल की इन प्रतिमाओं को देखने जा सकते है। ओम। 

15 नवंबर 2018

मां बंजारिन बास्तानार

मां बंजारिन बास्तानार......!

बस्तर के विभिन्न पहाड़ों में भी माता के कई मंदिर हैं, और हर आने जाने वाला यहां दो पल के लिए जरूर रुकता है। इन्ही पहाड़ियों में एक है मां बंजारिन का मंदिर, जो बास्तानार के वनाच्छादित पहाड़ों के मध्य बंजारिन घाट में प्रतिष्ठित है।

जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर जगदलपुर-बीजापुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्र.16 पर पहाड़ियों के बीच बंजारिन घाट है। माता का मंदिर गीदम से 10 किलोमीटर दुर जगदलपुर मार्ग पर है। बंजारिन घाट लगभग 15 किलोमीटर लंबा है।
घाटी की उंचाई से दूर बैलाडिला की पहाड़ियों के मनमोहक दृश्य दिखाई पड़ते है।  घाटी के मध्य मां बंजारिन का पुराना मंदिर है। देवी के प्रति क्षेत्र के लोगों में बड़ी आस्था है।

चैत्र और क्वांर नवरात्रि में माता की विशेष पूजा होती है। बंजारीघाट के जोखिम भरे रास्ते से गुजरने वाले वाले वाहन चालक निर्विघ्न यात्रा की कामना के साथ इस मंदिर के सामने रुकते हैं और देवी की अर्चना पश्चात ही आगे बढ़ते है। इसी तरह लोग केसकाल बारह भांवर घाट और दरभा के झीरम घाट में रूक कर मां तेलिनसत्ती की पूजा कर आगे बढ़ते हैं।

इन देवियों को बस्तर के अलावा बाहर के लोग भी पर्याप्त सम्मान देते हैं। ऐसे भक्तों ने ही बंजारी घाट, केसकाल घाट और झीरम घाट के मंदिरों को संवारा है।
मंदिर में देवी एवं भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमायें स्थापित है। बंजारिन घाट की हरी भरी वादियों में माता के दर्शन से अपार शांति मिलती है!

9 अक्टूबर 2018

बस्तर की आराध्य मां दंतेश्वरी

बस्तर की आराध्य मां दंतेश्वरी....!

प्राचीन काल से बस्तर शाक्त धर्म का केन्द्र रहा है। यहां आज भी देवी को सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है। देवी की पूजा अर्चना के बाद ही शुभ कार्य किये जाते है। देवी दंतेश्वरी का मंदिर दंतेवाड़ा के शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर सदियों पूर्व से स्थापित है। देवी दंतेश्वरी बस्तर की आराध्यदेवी है। देवी का मंदिर गर्भगृह अंतराल मंडप सभामंडप और महामंडप में विभक्त है। गर्भगृह प्रस्तर निर्मित है जो कि मूल मंदिर रहा है और काफी प्राचीन भी है।

गर्भगृह में देवी दंतेश्वरी की षटभूजी प्रतिमा स्थापित है जो काले ग्रेनाईठ से निर्मित है। आगे का हिस्सा बाद में परवर्ती चालुक्य काकतीय शासकों के समय निर्मित माना जाता है। काष्ठ का बना महामंडप बस्तर की महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी के समय निर्मित है। काष्ठ मंडप के कारण मंदिर के सामने के तीन अन्य प्रस्तर मंदिर उसके अंदर आ गये है जो कि भैरव और शिव को समर्पित है
मंदिर के बाहर गरूड़ स्तंभ स्थापित है। सभामंडप में गणेश भगवान की भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त मंदिर में कार्तिकेय दुर्गा विष्णु भैरव काली शिव पार्वती आदि देवी देवताओं की 50 से अधिक प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर में प्रवेश करने हेतु कुल 4 दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। दुसरे दरवाजे से ही गर्भगृह में स्थापित देवी दंतेश्वरी के दर्शन हो जाते है। देवी दर्शन के लिये धोती पहन कर मंदिर में प्रवेश करना अनिवार्य है। टेंपल कमेटी के द्वारा वहां धोती उपलब्ध रहती है।
मंदिर में नागयुगीन एवं काकतीय चालुक्यों के प्राचीन शिलालेख भी रखे हुये है। देवी दंतेश्वरी के मंदिर के पास ही देवी मावली का मंदिर भी बना हुआ है। देवी मावली को भुनेश्वरी देवी के मंदिर के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर के गर्भगृह में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त नरसिंह भैरव गणेश शिव आदि देवताओं की प्रतिमायें भी स्थापित है।
मंदिर के पीछे ही शंखिनी और डंकिनी नदियों का संगम है। संगम के उस पार भैरव बाबा का मंदिर है। भैरव बाबा के दर्शन के बिना देवी दर्शन अधुरा माना जाता है। भैरव मंदिर पास ही है।

देवी दंतेश्वरी के प्रति लोगों में अपार श्रद्धा है और यह श्रद्धा आज से नहीं हजारों सालों से है। देवी दंतेश्वरी नाग युग एवं उसके बाद चालुक्य काकतीय राजवंश की कुल देवी भी है। बस्तर का प्रत्येक सांस्कृतिक कार्यक्रम चाहे फाल्गुन मेला या बस्तर दशहरा हो सभी देवी की उपस्थिति में ही निर्विघ्न संपन्न किये जाते है। देवी दंतेश्वरी मंदिर को 52 वां शक्तिपीठ भी माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि देवी दंतेश्वरी का दांत यहां गिरा था जिसके कारण यह स्थान दंतेवाड़ा और देवी दंतेश्वरी के नाम से जानी गई । यहां एक अन्य किंवदंती भी प्रचलित है कि एक दंतकथा के मुताबिकराजा अन्नमदेव को उनकी कुल देवी ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि वे जहां तक जाएंगे वहां तक उनका राज्य होगा और स्वयं देवी उनके पीछे चलेगी, लेकिन राजा पीछे मुड़कर नहीं देखें। वरदान के अनुसार राजा ने वारंगल के गोदावरी के तट से उत्तर की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ की । राजा देवी के पायल के घुँघरूओं से उनके साथ होने का अनुमान लगा कर आगे बढ़ता गया ।
राजिम त्रिवेणी पर पैरी नदी तट की रेत पर देवी के पैर पर घुंघरुओं की आवाज रेत में दब जाने के कारण बंद हो गई तो राजा ने पीछे मुड़कर देखा तो देवी अंर्तध्यान हो गई बाद में राजा ने शंखिनी और डंकिनी के संगम पर देवी का मंदिर बनवाया।

प्रत्येक वर्ष नवरात्र में देवी दर्शन के लिये लोग दो सौ किलोमीटर दुर से भी पैदल चलकर आते है। नवरात्र में दंतेवाड़ा में बेहद भक्तिमय वातावरण रहता है। मार्गो में पदयात्री श्रद्धालुओं के लिये रूकने एवं खाने पीने की भी व्यवस्था रहती है। बस्तर दशहरा में देवी की डोली प्रत्येक वर्ष जगदलपुर जाती है। जगदलपुर में दशहरे में रथ पर देवी का प्रतीक छत्र को स्थापित कर रथों की परिक्रमा की जाती है।
फाल्गुन के समय देवी के सम्मान में फाल्गुन मेले का आयोजन किया जाता है। यह बस्तर का सबसे लंबा मेला है जो कुल 45 दिनों तक चलता है। मेले में भाग लेने के लिये बस्तर एवं आसपास के प्रांतों के पांच सौ से अधिक देवी देवता आते है।
हजारों साल से बस्तर शाक्त धर्म का केन्द्र था और आज भी बस्तर देवी शक्तियों की ही बस्तर है। देवी के आर्शीवाद से बस्तर आज प्राकृतिक रूप से संपन्न है और धीरे धीरे पुनः शांति का टापू बनने की ओर अग्रसर है।


दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 400 किलोमीटर की दुरी पर दक्षिण में स्थित है। जगदलपुर से यह रेल सेवा से भी जुड़ा है। हवाई रेल और सड़क मार्ग से दंतेवाड़ा पहुंच सकते है।
सभी मित्रों को नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाये जय माता दी।
Om Soni !

22 सितंबर 2018

लिंगई माता- यहाँ लिंग के रूप में होती है देवी की पूजा

लिंगई माता- यहाँ लिंग के रूप में होती है देवी की पूजा.....!

छत्तीसगढ़ के अलोर ग्राम में देवी का एक अनोखा मन्दिर विद्यमान है। इस मन्दिर में देवी की पूजा लिंग के रूप में होती है। या ऐसा कहें कि यह ऐसा शिवलिंग है जो देवी के रूप में पूजा जाता है। इस मंदिर में देवी की पूजा लिंग रूप में क्यों होती इसके पीछे मान्यता यह है कि इस लिंग में शिव और शक्ति दोनों समाहित हैं। यहाँ शिव और शक्ति की पूजा सम्मिलित रूप से लिंग स्वरूप में होती है। इसीलिए इस देवी को लिंगेश्वरी माता या लिंगई माता कहा जाता है।


कोंडागॉव जिले मे फरसगॉव से बड़े डोंगर के तरफ नौ किलोमीटर की दुरी पर अलोर ग्राम से लगभग 2 किमी दूर उत्तर पश्चिम में एक पहाड़ी है। इस पहाड़ी को लिंगई गट्टा कहा जाता है। इस छोटी पहाड़ी के ऊपर विस्तृत फैला हुआ चट्टान के उपर एक विशाल पत्थर है। इस पत्थर की संरचना भीतर से कटोरानुमा है। इस मंदिर के दक्षिण दिशा में एक सुरंग है जो इस गुफा का प्रवेश द्वार है। इस सुरंग का द्वार इतना छोटा है कि बैठकर या लेटकर ही यहां प्रवेश किया जा सकता है। गुफा के अंदर 25 से 30 आदमी बैठ सकते हैं। गुफा के अंदर चट्टान के बीचों-बीच निकला शिवलिंग है जिसकी ऊंचाई लगभग दो फुट है। कहा जाता है कि इसकी ऊंचाई पहले बहुत कम थी जो समयानुसार बढ़ रही है!! परम्परानुसार इस प्राकृतिक मंदिर में प्रतिदिन पूजा नहीं होती है। इस मन्दिर का द्वार वर्ष में केवल एक दिन के लिए ही खुलता है, और इसी दिन यहाँ विशाल मेला लगता है। 

संतान प्राप्ति की मन्नत लिये यहां हर वर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। प्रतिवर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष नवमीं तिथि के पश्चात आने वाले बुधवार को इस प्राकृतिक देवालय को खोल दिया जाता है, तथा दिनभर श्रद्धालुओं द्वारा दर्शन तथा पूजा अर्चना की जाती है।

इस देवी धाम से जुड़ी दो विशेष मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता संतान प्राप्ति के बारे में है। यहाँ आने वाले अधिकांश श्रद्धालु संतान प्राप्ति की मन्नत मांगने आते है। यहां मनौती मांगने का तरीका अनूठा है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति को खीरा चढ़ाना होता है । प्रसाद के रूप में चढ़े खीरे को पुजारी, पूजा के बाद दंपति को वापस लौटा देता है। दम्पति को शिवलिंग के सामने ही इस ककड़ी को अपने नाखून से चीरा लगाकर दो टुकड़ों में तोड़कर इस प्रसाद को दोनों को ग्रहण करना होता है। चढ़ाए हुए खीरे को नाखून से फ़ाडकर शिवलिंग के समक्ष ही (क़डवा भाग सहित) खाकर गुफा से बाहर निकलना होता है।

यहाँ प्रचलित दूसरी मान्यता भविष्य के अनुमान को लेकर है। एक दिन की पूजा के बाद जब मंदिर बंद कर दिया जाता है तो मंदिर के बाहर सतह पर रेत बिछा दी जाती है। इसके अगले साल इस रेत पर जो चन्ह मिलते हैं, उससे पुजारी अगले साल के भविष्य का अनुमान लगाते हैं। उदाहरण स्वरूप दृ यदि कमल का निशान हो तो धन संपदा में बढ़ोत्तरी होती है, हाथी के पांव के निशान हो तो उन्नति, घोड़ों के खुर के निशान हों तो युद्ध, बाघ के पैर के निशान हो तो आतंक तथा मुर्गियों के पैर के निशान होने पर अकाल होने का संकेत माना जाता है।

चूँकि प्रतिवर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष नवमीं तिथि के पश्चात आने वाले बुधवार को इस प्राकृतिक देवालय को खोल दिया जाता है, यहां दर्शन के लिये एक बार जरूर जाये---!

5 सितंबर 2018

बस्तर में जैन धर्म

बस्तर में जैन धर्म......!

बस्तर में राजभूषण महाराज सोमेश्वर देव (1069 ई से 1110 ई) ने चक्रकोट राज्य में जैन धर्म संरक्षण प्रदान किया था। तत्कालीन समय के चक्रकोट राज्य मेंजैन साधु निवास करते थे। छिंदक नाग राजाओं ने बस्तर में पारसनाथ, नेमिनाथ, आदिनाथ आदि जैन तीर्थंकरों की बहुत सी प्रतिमायें बनवायी थी। कुरूषपाल, बारसूर, नारायणपाल, बोदरा आदि स्थानों में आज भी ये प्रतिमायें देखने को मिलती है।
बस्तर के आसपास ओडिसा क्षेत्र में खारवेल के समय से ही जैन धर्म का प्रभाव स्थापित हो गया था परन्तु बस्तर में सिर्फ नागवंशी शासक सोमेश्वर देव ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया था। ग्यारहवी सदी से पूर्व की जैन धर्म की कोई भी प्रतिमा या अवशेष बस्तर में प्राप्त नहीं होते है। सोमेश्वरदेव का राज्य कोरापुट एवं जयपोर से आगे तक विस्तृत था। इस क्षेत्र में उसके सामंत चंद्रादित्य का शासन था। इस क्षेत्र में पूर्व से प्रचलित जैन धर्म को सोमेश्वरदेव ने भरपूर संरक्षण एवं सहयोग दिया था।
बस्तर के पास जयपोर - कोरापुट क्षेत्र में जैन तीर्थंकरों की पुरानी प्रतिमा एवं जिनालय आज भी सुरक्षित अवस्था मे मिलते है। जयपोर से आगे अरकु जाने वाले मार्ग में नंदपुर ग्राम है इस नंदपुर ग्राम के पास ही मुख्य सड़क पर सुबई नामक छोटा सा गांव है। इस सुबई गांव में जैन मंदिर बने हुये है।
ये मंदिर एक समुह में है जिसमें कुल 5 मंदिर है। जिसमें सभी मंदिर सुरक्षित एवं सही अवस्था में है। आकार में ये छोटे मंदिर मात्र गर्भगृह युक्त है। जिसमें यक्षिणी, ऋषभदेव, की प्रतिमायें स्थापित है। ये सभी मंदिर आठवी सदी में निर्मित माने गये है। बस्तर से सबसे पास में ही सुबई के ही जैन मंदिर है जो सबसे पुराने है।
ये बस्तर कोरापुट क्षेत्र में सदियों से प्रचलित जैन धर्म के मूक गवाह है जो आज भी शान से खड़े है। सड़क मार्ग से जयपोर से अरकु जाते समय इन मंदिरों को देखा जा सकता है....ओम!