21 मई 2020

बस्तर का 1842 का तारापुर विद्रोह.

बस्तर का 1842 का तारापुर विद्रोह.....!

सत्ता के लालच मे दरियादेव ने बस्तर को अंग्रेजी और मराठा शासन के अधीन कर दिया. अप्रैल 1778 इस्वी की कोटपाड़ सन्धि ने मराठा और अंग्रेजो को बस्तर मे प्रवेश सुगम कर दिया. कोटपाड़ की सन्धि के एवज मे दरियादेव कम्पनी सरकार, मराठो एवं जैपुर राज्य की मदद से अपने भाई अजमेर सिंह को पराजित करने मे सफल हो पाया.
इस सन्धि के बदले जहाँ धाराधिनाथ दरियादेव बस्तर के सिंहासन पर बैठने मे सफल रहा वही बस्तर के महत्वपूर्ण परगने जैपुर राज्य मे चले गये. नागपुर के भोसलो को सालाना टकोली देने की शर्त भी स्वीकार करनी पडी. अंग्रेज तो बस बस्तर मे प्रवेश के मौके का इंतजार कर रहे थे, कोटपाड़ सन्धि से उन्हे यह अवसर आसानी से मिल गया. आंग्ल मराठा शासन के नियंत्रण का नुकसान सबसे अधिक बस्तर की रियाया को उठाना पडा. आंग्ल मराठो के अनुचित हस्तक्षेप से बस्तर की जनता को विद्रोह का रास्ता अख्तियार करना पड़ा.
फिर तो विद्रोह का सिलसिला चल पडा. 1825 इस्वी के परलकोट के विद्रोह से प्रारम्भ हुआ यह सिलसिला 1910 इस्वी के भूमकाल विद्रोह तक चलता रहा.1842 इस्वी का तारापुर विद्रोह भी मराठा अतिक्रमण और राजपरिवार मे मराठो एवं अंग्रेजो के अनुचित हस्तक्षेप से उपजा हुआ विद्रोह था.1818 इस्वी की आंग्ल और भोसलो की सन्धि से बस्तर की शक्तियां सीमित कर दी गयी. इस सन्धि से भोसले राजा बन गये और राजा जमीदार बन गये. संधि फलस्वरुप बस्तर से वसूली जाने वाली टकोली मे भी बढोतरी की गयी. जिसका परिणाम स्वरुप तारापुर में विद्रोह हुआ.दरियादेव की मृत्यु के बाद 1800 इस्वी मे दरियादेव का पुत्र महिपाल देव बस्तर के राजा बने. महिपाल देव के तीन पुत्र हुए भूपालदेव, दलगंजन सिंह और निरंजन सिंह. महिपाल देव की मृत्यु के बाद 1842 इस्वी मे भूपाल देव बस्तर के राजा बने. भूपालदेव ने अपने भाई लाल दलगंजन सिंह को तारापुर परगने का अधिकारी बना दिया. लाल दलगंजन सिंह दबंग व्यक्तित्व, सदाचारी एवं पराक्रमी था. वह अपने सदव्यवहार से बस्तर की जनता मे अधिक लोकप्रिय था. भूपालदेव और दलगंजन सिंह मे अनेक कारणो से अनमेल रहा.जगदलपुर से 26 किलोमीटर की दुरी पर अवस्थित तारापुर परगना रियासत काल मे राजस्व श्रोत के बजाय जैपुर राज्य के विरुद्ध सैनिक छावनी के रुप मे माना जाता था. तब गर्वनर के रुप मे लाल दलगंजन सिंह तारापुर परगने की देख रेख कर रहे थे.बस्तर राजा ने नागपुर सरकार के आदेश पर तारापुर परगने की टकोली बढा दी थी तब तारापुर के गवर्नर लाल दलगंजन सिंह ने विरोध किया. जब दलगंजन सिंह पर नागपुर सरकार का दबाव बढा तब तो उन्होने टकोली के माध्यम से लूट की स्वीकृति के बजाय तारापुर छोड़ देना का निश्चय किया. तारापुर के आदिवासियो ने लाल को तारापुर छोड़ कर ना जाने का आग्रह किया और लाल दलगंजन सिंह के नेतृत्व मे आंग्ल मराठा शासन के विरुद्ध बगावत करने का निर्णय किया.तारापुर विद्रोह के और भी कारण थे जैसे मराठो की रसदपूर्ति मे सहायक बंजारो ने आदिम जीवन शैली को भंग कर दिया था. तारापुर पर परगने पर राजस्व की माँग बढ़ने के कारण निरन्तर अवैधानिक टैक्स वसूले जा रहे थे और रैय्यत उससे परेशान हो चुकी थी. लाल दलगंजन सिंह और उसके साथी, दीवान जगबन्धु के द्वारा नित्य प्रति नये टैक्स के आरोपित करने के कारण बहुत उत्तेजित थे और उनकी माँग थी कि जब तक दीवान जगबन्धु को हटा नहीं दिया जाता और सारे टैक्स वापस नहीं ले लिये जाते, आदिवासी संघर्ष करते रहेगे.आदिवासियो ने एक दिन दीवान को पकड़ लिया और उसे अपने नेता दलगंजन सिंह के सामने तारापुर में प्रस्तुत किया तब राजा भूपालदेव ने जगन्नाथ बहीदार के हाथो सन्देश भेजा कि दीवान को मुक्त किया जाया. दलगंजन सिंह को आदिवासियो के भारी विरोध के बावजूद भी दीवान को मुक्त करना पड़ा.रिहा होने के बाद दीवान जगबन्धु भूपालदेव के आदेश से नागपुर गये. वहां उन्होंने नागपुर के अधिकारियो से तारापुर विद्रोह को कुचल देने की सहायता मांगी. नागपुर की सेनाओ ने बस्तर कूच किया. तारापुर मे आदिवासियो के साथ उनका घमासान युद्ध हुआ. विद्रोही सेना पराजित हुई. दलगंजन सिंह को नागपुर की सेनाओ के समक्ष आत्म समर्पण करना पड़ा. उन्हें गिरफ्तार कर नागपुर ले जाया गया जहाँ उन्हे छ महिने की जेल हुई. आदिवासियो के असंतोष को दुर करने के लिए नागपुर के रेजीडेण्ट मेजर विलियम्स ने बाद मे जगबन्धु को दीवान के पद से हटा दिया और तब विद्रोह शान्त हो गया, क्योकि वैसी स्थिति मे सारे नये अध्यारोपित टैक्सो को वापस ले लिया गया था. आलेख - ओमप्रकाश सोनी संदर्भ..1 बस्तर का मुक्ति संग्राम - शुक्ल हीरालाल 2 बस्तर भूषण - केदारनाथ ठाकुर 3 बस्तर इतिहास और संस्कृति - लाला जगदलपुरी
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बस्तर : जहां दूल्हा पक्ष याचक की भूमिका में दिखता है

बस्तर : जहां दूल्हा पक्ष याचक की भूमिका में दिखता है..!
यह बस्तर की अनेक खासियतों में एक है, जहां वर यानी दूल्हा पक्ष वधु पक्ष के सामने याचक बनकर जाता है। माहला यानी सगाई की रस्म में गुड़-चिवड़ा(पोहा) पूरे समाज के सामने रखकर वधु का हाथ मांगा जाता है। झुककर प्रणाम कर रिश्ता स्वीकारने की याचना की जाती है। इस प्रथा का सबसे उजला पक्ष यह है कि इसमें दहेज दानव और वर पक्ष के नखरों के लिए कोई जगह नहीं होती है
यही नहीं, शादी में वधु पक्ष की तरफ का अधिकांश खर्च भी वर पक्ष को वहन करना पड़ता है, जिसे शादी का जोड़ा कहते हैं। यहां आदिकाल से निवासरत कुछ समाजों में यह परंपरा अब भी बदस्तूर जारी है। समय के साथ आंशिक बदलाव यह हुआ है कि घर में मूसल या ढेंकी से कूटे गए चिवड़ा की जगह दुकान में मिलने वाले रेडीमेड पोहा ने ले ली है। साथ ही कुछ मिठाई व नमकीन भी शामिल हो गए हैं, लेकिन सगाई की रस्म गुड़-चिवड़ा की मिठास के बगैर पूरी नहीं होती है।हां, एक बात और.. वधु पक्ष ने चिवड़ा स्वीकार लिया तो रिश्ता पक्का। अगर बाद में रिश्ता नहीं जमा तो शादी से पहले वधु पक्ष के पास गुड़-चिवड़ा लौटाने का वीटो पावर भी होता है। (आलेख साभार रू शैलेन्द्र ठाकुर, दन्तेवाड़ा)
(टीप: यह तस्वीर 2 साल पुरानी है। वर्तमान लॉक डाउन अवधि की नहीं है।)
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भूमकाल की प्रतीक - लाल साहब की कटार

भूमकाल की प्रतीक - लाल साहब की कटार...! 
भूमकाल की तैयारियाँ गुप्त रुप से चल रही थी. विभिन्न आदिवासी नेता, गुण्डाधुर, लाल कालेन्दर सिंह सरिखे भूमकाल के मुख्य नेता अलग अलग मोर्चो पर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भूमकाल के लिए मोर्चाबन्दी कर रहे थे. गुण्डाधूर बस्तर के महान भूमकाल का नायक था तो वही बस्तर रियासत के भूतपूर्व दीवान लाल कालेन्दर सिंह का भूमकाल को समर्थन था.लाल कालेन्दर सिंह बस्तर महाराज भैरमदेव के चचेरे भाई एवं भूमकाल के समय बस्तर राजा रुद्रप्रताप देव के चाचा थे. 1842 इस्वी मे बस्तर के राजा महाराजा भूपालदेव थे. इनके छोटे भाई लाल दलगंजन सिंह थे जिन्होने तारापुर विद्रोह मे मुख्य भूमिका निभाई थी.भूपालदेव के पुत्र भैरमदेव बस्तर राजा बने वही दलगंजन सिंह के पुत्र कालेन्दर सिंह बस्तर के दीवान बने. लाल साहब का मुख्यालय ताडो़की था. उन्हे कर मुक्त 35 गाँव दिये गये थे.
भूमकाल की अन्तिम योजना अनुसार साल 1910 के जनवरी महिने मे अन्तागढ के पास ताडो़की मे आदिवासी नेताओ और लाल कालेन्दर साहब ने गुप्त महा सम्मेलन का आयोजन किया. इस सम्मेलन मे आदिवासियो ने बस्तर को ब्रिटिश परतंत्रता से मुक्ति दिलाने हेतु संकल्प लिया गया.उक्त सम्मेलन के बाद ताडो़की के स्थानीय देवी मन्दिर मे हरचंद नायक नामक स्थानीय पुजारी ने लाल साहब तथा आदिवासियो के साथ सामूहिक पूजा की तथा सभी ने यह संकल्प लिया कि देवी दंतेश्वरी के वस्त्र मे दाग नहीं लगने देगे.पूजा के बाद लाल कालेन्दर सिंह ने आदिवासी नेताओ को एक कटार भेंट की. यह कटार महान विप्लव मे उनके समर्थन की एक प्रतीकात्मक वचनबद्धता थी. यह कटार एक हाथ से दुसरे हाथ, तथा एक क्षेत्र से दुसरे क्षेत्र से गुजरते गयी और गुजरने का अर्थ था - आदिवासियो को शस्त्र उठा लेने का आव्हान.यह कटार जहाँ जहाँ पहुँची, वहां वहां के लोगों ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह मे स्वयम् को झोक दिया था. माना गया कि कटार मंत्रशक्ति से अभिचारित थी और देवी दंतेश्वरी का प्रतीकात्मक आदेश था - असुरो का संहार करो. कालान्तर मे यह कटार सुकमा जमीदार के दीवान जनकैय्या के हाथ मे आयी और जनकैय्या ने अपनी ब्रिटिश प्रतिबद्धता के कारण इसके प्रचार को रोक दिया.तदनुसार सुकमा के दक्षिण मे यह कटार नहीं पहुंच पायी, जिससे वहां विद्रोह की तीक्षणता का अहसास नहीं हुआ. भूमकाल के दमन के लिये जब सेना की टुकडी सुकमा पहुँची तो उन्होंने लाल साहब की कटार जब्त कर ली.इसके बाद उस कटार की कोई जानकारी नहीं.प्रस्तुत कटार का चित्र सांकेतिक है.
आलेख - ओमप्रकाश सोनी


दानशीलता के लिये प्रसिद्ध कांकेर की रानी बड़गहिन माँ (कलचुरि)

दानशीलता के लिये प्रसिद्ध कांकेर की रानी बड़गहिन माँ (कलचुरि).....!

दक्षिण कोसल के कलचुरि डाहल या चेदि के कलचुरियो के वंशज है , जिनकी राजधानी जबलपुर के पास त्रिपुरी थी. इन कलचुरियो ने छत्तीसगढ़ के इतिहास मे एक नये काल की शुरुआत की है.कोकल्ल द्वितीय (900 से 1015 ई) के राज्यकाल मे उसके 18 पुत्रो मे से एक कलिंगराज ने 1000 इस्वी के लगभग दक्षिण कोसल पर आक्रमण यहाँ राज्य स्थापित किया और तुम्माण मे अपनी राजधानी स्थापित की. दक्षिण कोसल मे 1000 इस्वी से सन 1750 इस्वी तक कलचुरियो ने शासन किया.कालांतर मे छत्तीसगढ़ मे कलचुरियो की दो शाखाओ ने अलग अलग क्षेत्र मे अपना राज स्थापित किया. कलचुरि शासको की एक शाखा ने रतनपुर तो दुसरी शाखा ने रायपुर से अपना शासन चलाया. रायपुर शाखा मे 1741 इस्वी मे अंतिम कलचुरि शासक अमर सिंह शासन कर रहे थे. इनके शासनकाल मे भोसला सेनापति भास्कर पन्त ने रतनपुर शाखा पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया , उसके बाद मराठो ने 1750 इस्वी में रायपुर शाखा के कलचुरि शासक अमर सिंह की गद्दी छिन ली.
1753 इस्वी मे अमर सिंह की मृत्यु उपरान्त शिवराज सिंह को सत्ता से बेदखल कर मराठो ने महासमुन्द के पास ष् बड़गाँवष् नामक माफी गाँव देकर रायपुर जिले के प्रत्येक गाँवो से एक रुपया वसुली का अधिकार दिया.यह व्यवस्था 1822 इस्वी तक चली.शिवराज सिंह के पुत्र रघुनाथ सिंह को बड़गाँव के पास गोविन्दा , मुरहेना, नाँदगाँव तथा भलेसर नामक कर मुक्त ग्राम दिये गये, यह व्यवस्था ब्रिटिशकाल तक चलती रही. रियासतकाल ने कलचुरि शासको के वंशजो के इस बड़गाँव जमीदारी की कन्या शिवनन्दिनी का विवाह कांकेर के राजा कोमलदेव के साथ हुआ जो कि बड़गहिन रानी के नाम से जानी गयी.कांकेर के राजा कोमल देव (1904 ई - 1925 ई) की तीन रानियाँ थी. पहली रानी लांजीगढ की पदमालय देवी थी जिससे आठ सन्ताने हुई किंतु एक भी सन्तान जीवित नहीं बची तब राजा कोमलदेव ने बड़गाँव के कलचुरि जमींदार खेमसिंह की रुपवती कन्या शिवनन्दिनी से दुसरा विवाह किया. दीवान दुर्गा प्रसाद ने शिवनन्दिनी को राजिम के मेले मे देखा था. तब बड़गाँव जमींदारी की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कन्या पक्ष को सामने बुलाकर कोमलदेव ने शिवनन्दिनी से विवाह किया. बड़गाँव की होने के कारण शिवनन्दिनी देवी बड़गहिन रानी कहलायी.कोमलदेव ने शिवनन्दिनी देवी के लिए कांकेर मे महल भी बनवाया था. राजा कोमलदेव 1925 मे स्वर्ग सिधार गये तब निरूसन्तान रानी शिवनन्दिनी ने 1982 मे अपने मृत्यु तक दान धर्म एवं धार्मिक कार्यो मे ही अपना जीवन व्यतीत किया.शिवनन्दिनी देवी बहुत धार्मिक एवं दानशील थी. उन्होने कांकेर के बालाजी मन्दिर को देवरी गाँव की जमीन दान मे दी तब यह गाँव बालाजी देवरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ. उन्होने राधाकृष्ण मन्दिर को भी काफी जमीन दान थी. उनके यहाँ से कोई भी याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटता था. रानी अपनी दानशीलता के लिए पुरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध थी. निर्धन माता पिता की कन्याओ के विवाह का खर्च भी रानी बड़गहिन माँ ही उठाती थी. कांकेर मे नदी के किनारे किनारे तक सारंगपाल माटवाडा तक कई किलोमीटर लम्बा बाग भी लगवाया जिसे रानी बाग कहा जाता था. दुध नदी मे जब भी बाढ आती थी तो राजमाता शिवनन्दिनी देवी प्रजा की फरियाद पर पैदल ही महल से आती और इस उफनती मे सोने की छोटी नाव अर्पित कर नदी का क्रोध शान्त कर देती थी, दस मिनट में नदी की बाढ़ उतरनी प्रारम्भ हो जाती थी. यह नजारा देखने वाले कई चश्मदीद गवाह आज भी जीवित है. रानी ने अन्तिम बार 1976 इस्वी मे आयी बाढ़ के समय यह करिश्मा किया था. फरियादी की मदद करते हुए और दान धर्म जैसे पूण्य कर्म करते करते बड़गहिन रानी माँ 1982 मे परलोक सिधार गयी. आज भले ही रानी बड़गहिन हमारे बीच नहीं है किन्तु दीन दुखियो की मदद और उनके धार्मिक दान कार्य की चर्चा कर आज भी उन्हें याद किया जाता है.
सभी माताओ को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..!
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आलेख... ओम प्रकाश सोनी

"भगवान सूर्य" की सजीव प्रतिमा

"भगवान सूर्य" की सजीव प्रतिमा....!
शिल्पी ने प्रतिमा का निर्माण पुरा मन लगाकर किया है जिससे प्रतिमा ऐसी जीवन्त बन गयी है कि लगता है भगवान सूर्य अभी अपने नेत्र खोलकर पुरे संसार मे ऐसी रोशनी बिखेर देगे जिससे हर प्राणी मात्र तृप्त हो जायेगा. एक ग्राम मे अपेक्षित इस सजीव प्रतिमा के मुख मण्डल मे ऐसा आकर्षण बस्तर के किसी प्रतिमा मे देखने को नहीं मिला. यह जीवित सी लगने वाली प्रतिमा भगवान सूर्य की है. प्रतिमा मे दोनो हाथ खंडित है किन्तु कन्धे पर कमल की कलियों के अंकन से प्रतीत होता है कि दोनों हाथो मे सनाल कमल कलियाँ धारित रही होगी.
चरणो मे भगवान सूर्य की अन्य प्रतिमाओ की तरह लम्बे बूट का अभाव है. हालाकि नाग शासन काल मे निर्मित यह प्रतिमा प्रकृति और उपेक्षा की मार से क्षरित हो गयी है तथापि इसके मुख मण्डल का अप्रतिम सौन्दर्य अभी भी काफी प्रभाव शाली है. सिर पर मुकुट धारण किये और कानो मे बड़े बड़े कुण्डल पहने हुए सूर्य देव की प्रतिमा रौद्र एवं सौम्यता का मिश्रित भाव लिये हुए है. एक तरफ अधिक क्षरित होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान सूर्य क्रोधित है एवम वही दुसरी तरफ से सौम्यता का भाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है. उस शिल्पकार को नमन जिसने इस जीवन्त प्रतिमा का निर्माण किया.
ओम्
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20 मई 2020

लहुरा गजपति सदा सलामत

लहुरा गजपति सदा सलामत
लहुरा गजपति सदा सलामत...!

बस्तर अपने आप मे जितना रहस्यमयी है उतना ही यहाँ का इतिहास भी रहस्यमयी है. बस्तर इतिहास के  बहुत से पहलू आज भी इतिहासकारो एवं आमजनो के लिये शोध एवं आश्चर्य का विषय है. पूर्ववती नल एवं नाग राजाओ के भाँति बस्तर के चालुक्य काकतीय राजवंश के इतिहास मे ऐसी बहुत सी पहेलिया है जिसे आज तक बूझा नहीं जा सका है.1324 ईस्वी के बाद से बस्तर मे स्थापित काकतीय राजवंश की इतिहास की जानकारियो के लिये बहुत सी वंशावली एवं अन्य लिखित दस्तावेज उपलब्ध है. दंतेवाडा स्थित शिलालेख अनुसार महाराज दृगपाल देव (1680- 1709इस्वी) नवरंगपुर जीतने की खुशी मे अपनी महारानी और युवराज रक्षपाल देव सहित मंदिर मे देवी दर्शन हेतु पधारे थे. दृगपाल देव की मृत्यु उपरांत तेरह वर्ष की आयु मे 1709 इस्वी मे रक्षपाल देव बस्तर की गद्दी पर आसीन हुए. रक्षपाल देव को राजपाल देव भी कहा गया है. (संदर्भ हीरालाल शुक्ल बस्तर का मुक्तिसंग्राम) प्रतापराज देव (1602 - 1625 इस्वी ) ने नाग सरदारो से डोंगर के तरफ के 18 गढो को जीतकर अपने राज्य मे मिलाया था. तब से डोंगर भी चालुक्य काकतीय  राज्य का दुसरा मुख्यालय बन गया था. दृगपाल देव के समय युवराज राजपाल देव डोंगर मे शासन सम्भाल रहे थे.अंग्रेज अधिकारी ब्रेत ने द छत्तीसगढ़ फ्युडिटरी स्टेट गजेटियर मे लिखा है कि बस्तर राजा रक्षपाल देव के समय  डोंगर की शाखा और बस्तर की शाखा एक हो गयी. डोंगर शाखा के राजा के अधिकार मे बस्तर शाखा भी आ गयी. तब राजधानी डोंगर से उठकर मूल शाखा बस्तर चली गयी. और राजा को लहुरा गजपति की उपाधि मिली.( संदर्भ काकतीय युगीन बस्तर के के झा) तब से बस्तर राजाओ की मंगलकामना मे लहुरा गजपति सदा सलामत का प्रयोग किया जाने लगा. 

आलेख ओम प्रकाश सोनी